Games People Play By Eric Berne Hindi Summary

Games People Play By Eric Berne Hindi Summary with Ebook Dowonload [pdf]

---------- About Book ----------

क्या आपको कभी ऐसा लगा कि लोगो के साथ आपका इंटरएक्शन कोई गेम हो सकता है? कभी आपने अपनी डेली लाइफ के सोशल इंटरएक्श्न्स के बारे में गौर से सोचा है? आपका सोशल इंटरएक्शन कैसे डेवलप होता है, ये कभी सोचा है? आप जो करते है, उसके पीछे क्या वजह है? क्या आपको मालूम है आपके हर एक्शन के पीछे कोई मीनिंगफुल रीजन होता है? ये समरी आपके इन्ही सारे सवालों का जवाब है. इस बुक के थ्रू आप अपने बिहेवियर के बारे में इतना कुछ जान सकते है जो आपने कभी सोचा भी नहीं होगा.

ये समरी किस किसको पढनी चाहिए? 

• जो ह्यूमन साइकोलोजी और ह्यूमन बिहेवियर को और अच्छे से समझना चाहते है. 

• स्पेशली टीनएजर्स को ताकि वो अपने टीनएज रिलेटेड इश्यूज बैटर ढंग से समझ सके. 

• हर वो इंसान जो अपनी लाइफ और अपने रिलेशनशिप्स में पोजिटिव एनेर्जी लाना चाहता है. 

ऑथर के बारे में (About the Author)

एरिक बर्न एक रिस्पेक्टेड साइकिएट्रिस्ट है. वो ट्रांसएक्श्न्ल ऐनालिसिस के फाउंडर है जोकि सोशल इंटरएक्शन की एक थ्योरी है जो ह्यूमन बिहेवियर को एक्सप्लेन करती है. डॉक्टर बर्न ने अपने करियर का एक बड़ा हिस्सा ट्रांसएक्श्न्ल ऐनालिसिस को स्टडी करने और उसे लोगो को सिखाने में बिताया है. 

---------- Summary ----------

इंट्रोडक्शन (Introduction)

क्या आपको कभी ऐसा लगा कि लोगो के साथ आपका इंटरएक्शन कोई गेम हो सकता है? कभी आपने अपनी डेली लाइफ के सोशल इंटरएक्श्न्स के बारे में गौर से सोचा है? आपका सोशल इंटरएक्शन कैसे डेवलप होता है, ये कभी सोचा है? आप जो करते है, उसके पीछे क्या वजह है? क्या आपको मालूम है आपके हर एक्शन के पीछे कोई मीनिंगफुल रीजन होता है? ये समरी आपके इन्ही सारे सवालों का जवाब है. इस बुक के थ्रू आप अपने बिहेवियर के बारे में इतना कुछ जान सकते है जो आपने कभी सोचा भी नहीं होगा.

इस बुक की समरी आपके सोशल इंटरएक्श्न्स के बेहद डीप लेयर्स को अनफोल्ड करके उनके पीछे छुपे मिनिंग्स आपके सामने रखेगी. ये आपको अपने सोशल इंटरएक्श्न्स को क्लीन और अच्छा रखना में काफी हेल्प कर सकती है. और लोगो से बात करते वक्त आप बीच की लाइन्स का मतलब भी समझ पायेंगे. फिर आप क्लियरली समझ पायेंगे कि लोग दरअसल अंदर से कैसे है और आपके साथ वो क्या गेम खेल रहे है. तो चलो, स्टार्ट करते है इस बुक की समरी. 

एनालिसिस ऑफ़ गेम्स (Analysis of Games)

ये बुक गेम्स पीपल प्ले”डेली लाइफ में ह्यूमन बिहेवियर यानी इंसानी व्यवहार और हमारे सोशल बिहेवियर पर की गयी एक डीप स्टडी की तरह है. ऑथर एरिक बर्न ने ह्यूमन एक्श्न्स के पीछे छुपे सीक्रेट्स को समझने के लिए डीप स्टडी करने के बाद ही ये बुक लिखी है और ये समझाने की कोशिश की है कि ह्यूमन एक्श्न्स असल में कैसे कन्डक्ट होते है. उन्होंने सोशल इंटरएक्श्न्स को स्ट्रोक्स की तरह डिसक्राइब किया है फिर चाहे वो फिजिकल हो या वर्बल. क्योंकि हर इन्सान को किसी ना किसी लेवल पर इनकी नीड रहती है. जैसे कि एक बच्चे की नीड होती है कि उसकी माँ उसे बड़े प्यार और इंटिमेसी से स्ट्रोक करे यानी सहलाए.

एक टीचर जो अपने स्टूडेंट्स को एप्रीशियेट करता है, एक फ्रेंड् जो दुसरे फ्रेंड को एंकरेज करता है, ये सब स्ट्रोक के डिफरेंट फॉर्म ही तो है. एरिक बर्न ने ये भी डिसक्राइब किया है कि जिस तरीके से लोग सोशल इंटरएक्श्न्स करते है वो डेलीब्रेट नहीं होता. या तो उनके बिहेवियर पर उनकी अपब्रिगिंग यानी परवरिश का इन्फ्लुएंश रहता है या फिर वो सोसाइटी के हिसाब से ऐसा बिहेव करते है. कुल मिलाकर कुछ ऐसी भी सिचुएशंस होती है जो लोग अक्सर अवॉयड करना चाहते है. जैसे कि कुछ ऐसे साइकोलोजिक्ल इश्यूज जोकि रीज़ोल्व नहीं हो पाए है.

लोग अक्सर डेली लाइफ में कंसिस्टेंसी मेंटेन करना चाहते है, ठीक उसी तरह जैसे उन्हें स्ट्रोक्स की ज़रूरत पड़ती है. हर इंसान को इन स्ट्रोक्स की अपने हिसाब से ज़रूरत पड़ती है, जैसे एक्जाम्पल के लिए 2 स्ट्रोक्स का मतलब है “हेल्लो” और बदले में भी एक हेल्लो. और जब किसी इन्सान से इससे ज्यादा की उम्मीद नहीं होती तो रिसीवर इस एक्ट से डिस्टर्ब हो जाता है. जैसे कि मान लो दो लोग रोड पर एक दुसरे के सामने से गुजरते है.

वो एक दुसरे को सिर्फ थोडा बहुत जानते है लेकिन एक दुसरे को डेली बेसिस पे हाई हेल्लो बोलते है. इससे ज्यादा कुछ नहीं. लेकिन अगर किसी दिन इनमे से एक बंदा हेल्लो हाई के बजाये ये पूछे” हाउ आर यू” कैसे हो आप”? तो ज़ाहिर है दूसरा बंदा थोडा कन्फ्यूज़ हो जायेगा. वो सोचेगा कि पता नहीं क्या बात है जो सामने वाला आज मुझसे रुककर बात कर रहा है. अब एक और केस लेते है जहाँ दो लोग है और उनमें से एक दुसरे वाले को हाई बोलता है मगर दूसरा वाला उसका जवाब नहीं देता. अब पहले वाला ये सोचकर डिस्टर्ब हो जाएगा कि इसने मेरे हाई का जवाब नहीं दिया. 

थिसॉरस ऑफ़ गेम्स (Thesaurus of Games)

एरिक बर्न ने कुछ ऐसे कॉमन और इंट्रेस्टिंग गेम्स बताए है जो लोग डेली बेसिस में खेलना पसंद करते है. अब ये गेम्स डिस्ट्रक्टिव भी हो सकते है या कंस्ट्रक्टिव भी लेकिन ये ध्यान रहे कि इन्हें खेलने वाला इंसान जारूरी नहीं कि नेचर से भी डिस्ट्रक्टिवहोगा. हो सकता है कि वो किसी सर्टेन सिचुएशन की हिसाब से ये गेम खेल रहा हो. लेकिन गेम क्या खेला जा रहा है इससे ज्यादा मैटर करता है कि कैसे खेला जा रहा है क्योंकि आफ्टर आल ये किसी को पोजिटिव या नेगेटिव तरीके से अफेक्ट कर सकता है. तो चलो, कुछ इसी तरह गेम्स के बारे में जानते है जिन्हें इस बुक में एरिक बर्न ने एक्सप्लेन किया है और देखते है कि वो हमारी डेली लाइफ से रिलेट करते है या नहीं. 

 लाइफ गेम्स (Life Games)

जैसा कि नाम से ही पता चलता है लाइफ गेम्स वो होते है जिनका आपकी पूरी लाइफ में इम्पैक्ट पड़ता है. और कई बार इस गेम में हमारे आस-पास के इनोसेंट लोग भी इन्वोल्व हो जाते है.

द लाइफ गेम्स इन्क्ल्यूड 

अलग-अलग लाइफ गेम्स The Life Games includes:

1- एल्कोहोलिक (Alcoholic )

एल्कोहोलिक यानी शराबी लोगो से निपटना बड़ा मुश्किल होता है. ज्यादातर ये नशे की हालत में रहते है और उस वक्त उनका माइंड सही ढंग से काम नहीं करता. देखा जाए तो एक एल्कोहोलिक की लाइफ में कई लोग अपना रोल प्ले करते है और रुसके रिलेटिव्स उनमे से एक है. जैसे मान लो कोई आदमी सिरियस एल्कोहोलिक है. उसकी वाइफ बेचारी उससे बड़ी परेशान रहती है. वो चाहती है कि उसके हसबैंड की नशे की लत छूट जाए. एक दिन उनके पडोसी उनके घर खाने पर आते है. खाने के बाद उस आदमी ने पड़ोसियों को शराब ऑफर की.

अब अगर पडोसी एक पैग लेता है तो उस आदमी को भी 3-4 पैग पीने का मौका मिल जाता है. बाहर से देखने पर लगता है कि मेहमानों की अच्छी खातिरदारी हो रही है.लेकिन इसका एक साइकोलोजिकल साइड है. असल में मेहमानों के बहाने उस आदमी को भी ड्रिंक करने का मौका मिल गया. और वो ये भी जानता है कि मेहमानों के सामने उसकी वाइफ उसे कुछ बोल भी नहीं पाएगी. एल्कोहोलिक्स के साथ एक और सिचुएशन होती है, कि वो चाहते है कि कोई उन्हें ड्रिंक करने से रोके और उनकी इस आदत से छुटकारा दिलाए. एक बार ऐसे ही एक एडिक्टेड लड़की ने अपने फ्रेंड्स से पुछा कि वो उसके बारे में क्या सोचते है.

और जब उन्होंने उसे पोजिटिव कमेंट्स दिए तो उसने बोला” मेरे बारे में नेगेटिव चीज़े बताओ”. जब उसके फ्रेंड्स ने ऐसा करने से मना कर दिया तो वो घर आकर अपने पेरेंट्स से बोली” आप मुझे ड्रिंक करने से रोको और अगर मै ना मानू तो मुझे बेशक आप घर से निकाल देना या किसी रीहेब में डाल देना. उसके बाद हुआ क्या कि वो खुद पे कण्ट्रोल नहीं कर पाई और शराब पी ली. इस बार उसके पेरेंट्स ने उसे रीहेब में डाल दिया. हैरानी की बात तो ये है कि वो लडकी भी खुद रीहेव जाने को तैयार हो गयी क्योंकि उसे अपने पेरेंट्स से यही उम्मीद दी. 

2- उधार मांगने वाले (Debtor)

जिन्हें उधारी की आदत पड़ जाती है वो लोग अक्सर यही बोलते है” अगर मेरे सर पे इतना उधार नहीं होता” मतलब इन लोगो को यही लगता है कि अगर उन्होंने उधार नहीं लिया होता तो वो काफी कुछ अचीव कर सकते थे. जबकि सच तो ये है कि रियल में ये लोग अपनी लाइफ से काफी हद तक कंटेंट रहते है. एक और ऐसा ही गेम है जो कपल्स खेलते है” ट्राई एंड कलेक्ट”. ये लोग इतनी चालाकी से इसे खेलते है कि हर हाल में उनके लिए विन-विन सिचुएशन होती है. अब जैसे कि एक कपल है जो उधार लेकर ऐशो आराम की लाइफ जी रहे है. लेकिन वो कभी भी उधार नहीं चुकाते.

अगर क्रेडिटर उनसे पैसे मांग-मांग कर थक गया है और गिव अप कर लेता है तो कपल का इसमें बेनिफिट है. और अगर क्रेडिटर उन्हें उनके घर जाकर अपने पैसे डिमांड करता है तो ये लोग उसे गुस्से में उसे भला-बुरा बोलेंगे और क्या पता धक्के देकर घर से भी निकाल दे. उन्हें बोलने का बहाना मिल जायेगा कि क्रेडिटर बड़ा लालची है जो उनसे ज़बरन पैसे वसूल कर रहा है. और इस हालत में वो उसे एक पैसा भी वापस नहीं करेंगे. तो ये कपल असल में बाकि लोगो को भी ये शो करा रहे है कि उधारी लो और मजे की लाइफ जियो. 

3- किक मी (Kick me)

ज्यादातर जॉब लेस या एंटी-सोशल लोग ये गेम बहुत खेलते है. ऐसा लगता है कि उनके सर पे कोई साइन बोर्ड लगा है, जिसपे लिखा है” प्लीज़ डोंट किक मी”. और लोग बिलकुल यही करते है यानी ऐसे लोगो को हर जगह से किक मिलती है और फिर ये लोग रोते फिरते है” मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है?’ 

एक आदमी बार टेबल पे बैठा अपनी ड्रिंक्स एन्जॉय कर रहा था. वो अकेला अपने में मस्त बैठा था लेकिन उसकी ड्रेस और एटीट्यूड कुछ ऐसा था कि हर किसी का अटेंशन ग्रेब कर रहा था. फिर दो-चार शरारती टाइप के लोग आये और उसे चिढाने लगे. अब ये आदमी क्या सोचेगा? यही ना” मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है?’ 

4- नाऊ आई हेव गोट यू (Now I've Got You)

दरअसल ऐसे लोग कई मौको पर अपना गुस्सा अपने दिल में दबाकर बैठे होते है. उन सिचुएशंस में ये लोग खुद को बिलकुल हेल्पलेस मान लेते है. और फिर जब कोई इन पर दया करता है तो इन्हें बड़ा अच्छा लगता है. 

जैसे मान लोग कोई आदमी दिन भर की थकान के बाद आराम की नींद ले रहा है. तभी एक डिलीवरी बॉय उसके घर आता है जिससे उसकी नींद डिस्टर्ब हो जाती है. अब तो आदमी गुस्से से बडबड़ायेगा और अपना सारा गुस्सा उस डिलीवरी बॉय पर उतारेगा. जबकि डिलीवरी बॉय की यहाँ पर कोई गलती नहीं है. वो तो सिर्फ अपनी ड्यूटी कर रहा है. लेकिन वो आदमी अपनी दिन भर की फ्रस्ट्रेशन एक इनोसेंट डिलीवरी बॉय पर निकाल रहा है. तो ऐसे लोग अपना सारा गुस्सा, सारी भडास किसी ऐसे इन्सान पे निकलाते है जिसकी कोई मिस्टेक ही नहीं होती है और ना ही वो अपनी सफाई में कुछ बोल पाते है. 

5- सी व्हाट यू मेड मी डू (See What You Made Me Do)

ऐसे लोग भी अपनी गलतियों का ठीकरा दूसरो के सर फोड़ते है. इस गेम की 3 डिग्रीज होती है. 

1- एक माँ किचन में खाना बना रही है. वो नहीं चाहती कि खाना बनाते वक्त कोई भी उसे डिस्टर्ब करे. तभी उसका बच्चा वहां आकर कुछ पूछने लगता है तो माँ का ध्यान डाईवेर्ट हो जाता है और उससे गलती से कांउटर पर तेल गिर जाता है. अब वो गुस्से में अपने बच्चे से बोलेगी” देखा, तुम्हारी वजह से सारा आयल गिर गया”. जबकि असल में उसकी अपनी गलती से आयल गिरा है. तो उसका बच्चा फिर कभी उसे किचन में आके तंग नहीं करेगा. वो समझ जाएगा कि अपनी मदर को काम के वक्त डिस्टर्ब नहीं करना है. और यही चीज़ वो अपने बच्चो को भी सिखाएगा. तो इस तरह ये हैबिट नेक्स्ट जेनरेशन तक पास हो जायेगी क्योंकि ये गेम काफी ईजी और एक्स्ट्रीमली कॉमन है. 

2- डिग्री नंबर 2 कपल्स के बीच काफी कॉमन है. मान लो हसबैंड वाइफ शोपिंग पे जाते है. अगर सब ठीक रहता है तो हसबैंड खुश है और अगर कुछ गड़बड़ होती है तो वो वाइफ को ब्लेम करना स्टार्ट कर देगा की ये उसकी वजह से हुआ. 

3- ये डिग्री काफी इंटेंस है और कई बार डेंजरस भी हो सकती है. वाइफ हसबैंड से छुपकर ऑनलाइन शोपिंग करती है लेकिन जब बिल आता है तो हसबैंड पूछता है. बस, इस बात पे वाइफ उस पर चिल्लाने लगती है कि वो उसे कुछ भी खरीदने नहीं देता. और इसलिए उसने खुद अपने लिए शोपिंग की. यानी वाइफ कहना चाहती है कि उसका हसबैंड उसे कुछ खरीदने नहीं देता इसलिए उसे छुपकर शोपिंग करनी पड़ी. लेकिन सच तो ये है कि वाइफ की फ़िज़ूलखर्ची की वजह से हसबैंड उसे शोपिंग करने से रोकना चाहता है. 

मेरिटल गेम्स 

ये गेम्स ओल्ड और यंग कपल्स दोनों खेलते है. शादी का असली मतलब ही यही है कि दो लोग अपनी मैरिड लाइफ को हैप्पी रखने के लिए हमेशा कोम्प्रोमाइज करने को तैयार रहेंगे. और इसके लिए अपने रिश्ते में डेडीकेशन और जेंटलनेस लाने की ज़रूरत है ताकि ये रिश्ता लम्बा टिक सके. लेकिन इसके साथ ही कपल्स गेम्स खेलकर अपने-अपने कांफ्लिक्ट्स भी सोल्व करते रहते है, ये कई बार ये गेम्स सेफ होते है और कई बार हार्मफुल भी हो सकते है. 

जो गेम्स कपल्स खेलते है उनमे से कुछ ये है: 

1- कार्नर (Corner)

इस गेम में एक कपल हमेशा किसी ना किसी वजह से डोमिनेट होता रहता है. इसका एक एक्जाम्पल लेते है, एक वाइफ है जो मूवी देखने या वाक् पे जाना चाहती है. हसबैंड मान जाता है मगर जाने से पहले वाइफ हसबैंड को कुछ ऐसे कामो की लिस्ट बताती है जो उन्हें करने है. जबकि उसके हसबैंड ने कई बार बोला है कि वो एक-एक करके सारे काम कर देगा इसलिए थोडा वेट करे. अब इस बात पे हसबैंड को गुस्सा आ जाता है और वाइफ उसके साथ जाने से मना कर देती है. हसबैंड भी गुस्से में उसे अकेला छोडकर चला जाता है. अब यहाँ इस सिचुएशन के दो डिफरेंट एंगल्स है. या तो हसबैंड उसे अपने साथ बाहर लेकर जाना चाहता था लेकिन वाइफ ने उसे कामो की एक लिस्ट बता कर उसका मूड ऑफ कर दिया. या फिर हसबैंड ने जानबूझ कर वाइफ को मजबूर किया ताकि वाइफ नाराज़ हो जाए और फिर वो बाहर जाकर अपने फ्रेंड्स के साथ एन्जॉय कर सके. रीजन चाहे जो भी हो इसमें नुकसान वाइफ का ही हुआ है क्योंकि ये इश्यू उसी की तरफ से उठा था. 

2- कोर्टरूम (Courtroom)

इस गेम में अक्सर एक थर्ड पर्सन इन्वोल्व रहता है जो कपल को जज करता है. कई बार ये थर्ड पर्सन रोल पेरेंट या कोई फ्रेंड या फिर थेरेपिस्ट प्ले करते है. जैसे मान लो एक कपल थेरेपिस्ट के पास आया. वाइफ कंप्लेंट करती है कि उसका हसबैंड उसे ठीक से ट्रीट नहीं करता. तो हसबैंड अपनी सफाई में बोलता है कि उसकी वाइफ उसकी कभी रिस्पेक्ट नहीं करती. अब अगर थेरेपिस्ट हसबैंड को राईट बोलता है तो हसबैंड थोडा रिलेक्स फील करेगा और अगर वो बोलता है कि आप गलत हो तो हसबैंड के रिएक्शन पर डिपेंड करता है कि वो एग्री करता है या नहीं. अगर हसबैंड बोलता है कि” मुझे पता है मेरी गलती है” तो इसका मतलब वो एक ऑनेस्ट हसबैंड है. लेकिन जब वो इंटेंस रिएक्शन देता है तो इसका मतलब उसके माइंड में कोई गेम चल रहा है. 

ऐसे कपल जो आपस में अपने इश्यूज रीज़ोल्व नहीं कर पाते, उन्हें कोई थर्ड पर्सन चाहिए होता है जो उनकी बात सुने और उनकी प्रोब्लम सोल्व कर सके. दोनों पार्टनर किसी ऐसे इंसान से अपनी प्रोब्लम शेयर करना चाहते है जो ना सिर्फ उनके प्रति सिम्पथेटिक हो बल्कि दुसरे पार्टनर को गलत प्रूव भी करे. 

3- फ्रिजिड वुमन (Frigid Woman)

इस टाइप का गेम अक्सर औरते खेलती है जो अपने हसबैंड को हर बात के लिए ब्लेम करना चाहती है. क्योंकि इन औरतो को लगता है कि उनके हजबैंड्स को उनकी ज़रूरत नहीं है, उनकी फीलिंग्स का ख्याल नहीं है, बल्कि उन्हें तो सिर्फ उनकी फिजिकल बॉडी से प्यार है. अब अगर बेचारा हसबैंड वाइफ को इग्नोर करता है तो ये औरते उसे प्रोवोक करेंगी, उन्हें सेड्यूस करके या किसी और तरीके से अपने हसबैंड को अपनी तरफ खीचने की कोशिश करेंगी. और जब हसबैंड भी रिस्पोंड करता है तो फिर से रोना-धोना शुरू कर देंगी” तुम्हे तो सिर्फ मेरी बॉडी से प्यार है”. अब अगर हसबैंड डिसाइड करता है कि वो अपनी वाइफ को टच भी नहीं करेगा तो इसका सारा ब्लेम सिर्फ वाइफ पर जाता है क्योंकि उसने ही ये सब ड्रामा किया है. 

4- हैरिड (Harried)

जब कोई औरत 12 टाइप के डिफरेंट रोल्स प्ले करती है जैसे वाइफ, मदर, नर्स, मेड या हाउस कीपर वगैरह. तो अक्सर वो खुद को हैरीड बना लेती है. अगर वो गेम्स खेल रही है तो वो एक टाइम में एक ही रोल प्ले कर सकती है. लेकिन वो जानबूझ कर खुद के ऊपर सारा काम ले लेती है और मल्टीटास्कर बनने के चक्कर में डिजास्टर हो जाता है. और फिर सारा दिन काम करने के बाद या तो वो थककर चूर हो जाएगी या फिर बिमार पड़ सकती है. और वो अपने लिए तो कभी टाइम निकाल ही नहीं पाएगी. और कई बार इस तरह की सिचुएशन डिवोर्स की वजह भी बन जाती है.

5- स्वीटहार्ट (Sweetheart )

ये गेम भी मैरिड कपल्स खेलते है. एक बार एक ऐसा ही कपल अपने फ्रेंड्स की पार्टी में गया. वहां पर एक आदमी अपने फ्रेंड को बताता है कि उसकी वाइफ कितनी फ़िज़ूलखर्ची करती है और फिर अपनी वाइफ की तरफ मुडकर बोलता है” क्यों है ना स्वीटहार्ट?’ अब उसकी वाइफ क्या जवाब दे, वो इस पोजीशन में ही नहीं है कि उसकी बात से डिसएग्री कर सके या उसे एक्यूज़ कर सके. क्योंकि हसबैंड ने ये बात बड़े प्यार से उसे स्वीटहार्ट कहते हुए बोली थी. इस बात के पीछे एक्चुअल रीजन ये है: उस लेडी ने उस आदमी से शादी इसीलिए की थी क्योंकि उसके सबकांशस माइंड में यही था कि उसका हसबैंड उसे हर टाइप की फेसिलिटीज देगा. इस सिचुएशन में वो उसकी बेड हैबिट्स के बारे में बता रहा है मगर उसे स्वीटहार्ट बोलकर शरमिंदा होने से भी बचा रहा है. 

पार्टी गेम्स (Party Games)

अक्सर लोग टाइम पास के लिए पार्टीज वगैरह देते रहते है. अब ज़रूरी नहीं कि पार्टी का मतलब है कि अपने फ्रेंड्स या फेमिली के साथ कोई स्पेशिफिक गेदरिंग रखी जाए. कई बार ऑफिस मीटिंग से पहले या क्लास स्टार्ट होने से पहले भी पार्टी जैसा ही माहौल होता है क्योंकि इस फ्री टाइम में सोशल इंटरएक्शन खूब होता है. 

तो पार्टी गेम्स नॉर्मली लाईट टाइप के होते है और ओर्डीनेरी गेम्स थोड़े सिरियस टाइप के होते है. 

इनमे से 4 गेम्स ये है:

1- आंट इट ओफुल (Ain't it Awful)

जब एक्सपेक्टेशन के अपोजिट कोई चीज़ होती है तो अक्सर लोग बोलते है” आजकल तो किसी पे ट्रस्ट कर ही नहीं सकते”. फिर वो कुछ रेंडम से एक्जाम्पल देंगे जबकि रियेलिटी में वो सोसाईटी में लैक ऑफ़ सपोर्ट की बात कर रहे है. ऐसे ही कुछ और मिलते-जुलते एक्स्प्रेशन्स है जैसे” कितने शर्म की बात है”. क्योंकि असल में लोग अपनी सोसाइटी या फ्रेंड सर्कल से सिम्पेथी की उम्मीद रखते है. मान लोग किसी लड़की ने प्लास्टिक सर्जरी करवाई है., अब अगर उसकी सर्जरी ठीक से नहीं होती तो लोग उसके साथ बड़े सिम्पथेटिक वे में पेश आएंगे. लोग ये तो ज़रूर बोलेंगे” आंट इट ओफुल”, "Ain't it awful." और लोगो से ये बात सुनकर उस लड़की को भी एक सोशल अट्रेक्शन वाली सेटिसफेक्शन हो जाएगी. 

2- ब्लेमिश (Blemish )

अपनी इनसिक्योरीटीज अवॉयड करने के लिए लोग दूसरो की गलतियाँ निकालते है. दूसरो की गलतियों से उन्हें कुछ ऐसी बाते कहने चांस मिल जाता है” वो भी कोई दूध के धुले नहीं है”. एक बच्चा अपनी माँ से हमेशा यही बोलता है’ मै दूसरो अच्छा नहीं हूँ माँ”. लेकिन एडल्ट अपनी वीकनेस कभी एक्स्पेट नहीं करते. उन्हें हमेशा दूसरे लोगो में कमी नजर आती है. जैसे अगर कोई सिंगल है और उसकी कोई गर्लफ्रेंड उसके साथ महीने से ज्यादा नहीं टिकती तो वो इसके लिए खुद को जिम्मेदार नहीं समझेगा बल्कि ऊँगली उन लड़कियों पर ही उठाएगा. आमतौर पे ये कोई दूसरा आदमी होगा जिसका अपनी गर्लफ्रेड के साथ कई साल गुजारने के बाद अभी-अभी ब्रेक अप हुआ है. 

3- स्केलिमिएल (Schlemiel)

ये गेम खेलने वाले लोग बेसिकली दूसरो को रिएक्ट करने के लिए उकसाते है. या तो उन्हें माफ़ी देकर या उन्हें गुस्सा दिलाकर या चिढ़ाकर. ये लोग जानबूझ कर बात का बतंगड बनाते है ताकि कोई उनकी बात पे रिएक्ट करे. जैसे कि एक बार कुछ लड़कियां मिलकर ड्रिंक कर रही थी. उनमे से एक ने गलती से सोफे पे थोड़ी सी ड्रिंक गिरा दी और गिलास पटक के तोड़ दिया. लेकिन उसने तुरंत माफ़ी मांगते हुए होस्ट से कहा” अरे कोई बात नहीं, इट्स फाइन. अब बेचारा होस्ट काइंडनेस शो करने पर मजबूर हो जाएगा क्योंकि उसने उन लोगो को इनवाईट किया है. लेकिन शायद ये बात उसे अच्छी नहीं लगी होगी. तो सबके सामने वो कुछ बोल नहीं सकता. हालाँकि जिस लड़की ने ड्रिंक सोफे पे गिराई उसे होस्ट के शांत रिएक्शन से थोड़ी सेटिसफैक्शन तो मिल जायेगी. 

4- व्हाई डोंट यूं (Why Don't You)

ये गेम काफी ओल्ड है और हम सबने अपनी लाइफ में कभी ना कभी ये ज़रूर खेला होगा. ये गेम खेलने वाले लोग अक्सर बच्चे के रोल में होते है जो सोचते है कि” यूं आर नेवर गोइंग टू हेल्प मी, व्हाटएवर यू डू’ तुम कभी मेरी हेल्प नहीं करने वाले, चाहे कुछ भी हो जाये”. मान लेते है कोई आदमी है जो कन्फ्यूज़ है की उसे कौन सी जॉब करनी चाहिए. उसका फ्रेंड चाहता है कि वो सॉफ्टवेयर इंजीनियर की जॉब करे” हाँ लेकिन मै इसमें ज्यादा इंटरेस्टेड नहीं हूँ” वो आदमी अपने फ्रेंड को बोलता है. लेकिन फ्रेंड उसे तब तक मनाता रहता है जब तक कि वो चुपचाप मान नहीं जाता. वो उस आदमी को एक तरह की विक्ट्री वाली फीलिंग आती है कि उसने अपने फ्रेंड को अपने आर्ग्यूमेंट्स से चुप करा दिया है. 

अंडरवर्ल्ड गेम्स (Underworld Games)

जो लोग जेल की यात्रा करते रहते है यानी कभी अंदर कभी बाहर, वो इस गेम को खेलने म एक्सपर्ट होते है. रूल्स तोडना इन्हें अच्छा लगता है, इससे उन्हें एक टाइप की सेन्स ऑफ़ पॉवरमेंट फील होती है. एक नार्मल इंसान के तौर पर भी हम लोगो को कॉप्स एंड रोबेर्स जैसे गेम्स अच्छे लगते है जो कई बार रियेल रोबर्स भी पैदा करती है. और जो लोग ये गेम खेलना पसंद करते है, वो पकड़े जाना भी पसंद करते है. जैसे मान लो कोई चोर है. वो अपने क्राइम स्पॉट पर कोई ना कोई क्ल्यू छोड़ देता है ताकि पोलिस उसे पकड सके और जेल में डाल दे.

असल में उन्हें चोरी से ज्यादा पकड़े जाने में मजा आता है. ऐसा लगेगा जैसे ये लोग एक्चुअल में लूजर्स है जिन्हें पकडे जाने पर एक टाइप का सेटिसफेक्शन मिलता है. और इस गेम को खेलने के बाद वो एक न्यू गेम स्टार्ट करते है” वांट आउट”. एक प्रिजनर जेल से भागने की नाकाम कोशिश में पकड़ा जाता है. उसकी सेंटेंस यानी पनिशमेंट एक्सटेंड हो जाती है. अब उसे तो उदास होना चाहिए? राईट? लेकिन नहीं, असल में वो बड़ा खुश है क्योंकि उसे अपनी सजा बढवानी थी, उसे जेल से ज्यादा सेफ और स्टेबल प्लेस और कोई नहीं मिलेगा. इसीलिए उसने भागने का प्लान बनाया था ताकि उसे कुछ और टाइम जेल में रखा जाए. 

कंसल्टिंग रूम गेम्स (Consulting Room Games)

लोगो को लगता है कि साइकोथेरेपी उनकी हर प्रोब्लम का सोल्यूशन है और साइकोलोजिकल थेरेपी लेना सेफ है. मगर अफ़सोस की बात तो ये है कि इसके भी अपने गेम्स है. 

1 “आई एम् ओनली ट्राईंग टू हेल्प यू’ ( मै तो बस तुम्हारी हेल्प करना चाहता हूँ) I'm Only Trying to Help You”

कोई भी साईंकिएट्रिस्ट के पास जाने के बाद ही ये चीज़ रियेलाईज़ करता है कि उसे सही और प्रॉपर ट्रीटमेंट नहीं मिल रही. क्योंकि साईंकिएट्रिस्टउसका ठीक से ईलाज नहीं कर रहा. और जब पेशेंट उसे इस बारे में कुछ पूछता है तो साईंकिएट्रिस्टका एक ही जवाब होता है” मै तो सिर्फ तुम्हारी हेल्प करना चाहता हूँ” 

फाइनली पेशेंट कुछ पूछना ही छोड़ देता है, उसे यही लगता है कि सचमुच उसका ईलाज हो रहा है और साईंकिएट्रिस्टजो कर रहा है ठीक कर रहा है. 

2 इंडीजेन्स (Indigence)

लोग साईंकिएट्रिस्टके पास अपनी प्रोब्लम्स लेकर जाते है लेकिन साईंकिएट्रिस्ट उनके साथ “इंडीजेन्स” गेम खेलते है. और फिर ये लोग भी उन्हें इस गेम में को-ऑपरेट करने लगते है. एक लड़का जिसे एडीएचडी ADHD की प्रोब्लम थी, साईंकिएट्रिस्टके पास जाकर थेरेपी लेना स्टार्ट करता है. ये सिलसिला काफी लम्बा चलता है. साईंकिएट्रिस्टउस लड़के को बोलता है कि अगर उसे कम्प्लीटली ठीक होना है तो उसे अपनी लाइफ में कुछ चेंजेस लाने पड़ेंगे. लेकिन रियेलिटी में दोनों ही जानते है कि वो प्रीटेंड कर रहे है. साईंकिएट्रिस्टका ऐसा कोई इंटेंशन नहीं है कि वो इस सजेशन को फोलो करेगा और ना ही लड़का अपनी लाइफ में कोई चेंज लाने की कोशिश करेगा. असल्र में वो लड़का बड़े आराम से अपनी सारी प्रोब्लम्स साईंकिएट्रिस्टके उपर डाल के बैठा है. दोनों एक गेम खेल रहे है और दोनों का इसमें फायदा है. क्योंकि साईंकिएट्रिस्टअपने पेशेट से पैसे कमाता रहेगा और लड़का अपनी छोटी बड़ी हर प्रोब्लम खुद फेस करने के बजाये साईंकिएट्रिस्टके पास भागता रहेगा. 

गुड गेम्स (Good Games)

गेम्स अच्छे भी हो सकते है लेकिन सिर्फ तब जब खेलने वाला उन्हें बिना किसी को हर्ट किये पोजिटिव वे में खेले. अगर प्ल्येर्स अच्छे है और एक गुड मोटिवेशन के साथ खेल रहे है तो ये गेम क्रिएटिव और पोजिटिव भी हो सकते है. 

1- केवेलिएर (Cavalier )

जैसा कि हमने सेक्सुअल गेम्स के बारे में डिस्कस किया, ये गेम एक हार्मफुल गेम को भी अच्छा बना सकता है और उसमे पोजिटिव एनेर्जी ला सकता है. एक आदमी एक लेडी से बार में मिलता है. वो उसे इतना कन्विंस कर देता है कि वो उस आदमी पर ट्रस्ट करने लगती है. वो उसे कोम्प्लिमेंट्स देता है, उसे एंकरेज करता है लेकिन अपनी लिमिट में रहता है जिससे उस लेडी को उसकी जेंटलनेस का यकीन हो जाता है. ये एक सही तरीका है क्योंकि इस तरह उसे उस लेडी को लाइफ टाइम के लिए अपना बनाने का चांस मिल सकता है अगर वो यूं ही पोजिटिवली खेलता रहे. 

2- हैप्पी टू हेल्प (Happy to Help)

कुछ लोग बिना लालच के दूसरो की हेल्प करते है. उनका कोई लालच नहीं होता वो सिर्फ अपनी ख़ुशी से लोगो की हेल्प करते है. उनके दोस्त भी होते है और दुश्मन भी मगर उनके हेल्प का मोटिवेशन चाहे कुछ भी हो आखिर वो एक अच्छा काम तो कर रहे है. लोगो की हेल्प करके उनके साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाना एक अच्छी शुरुवात है. 

3- दे विल बी ग्लैड दे न्यू मी (They'll Be Glad they knew me)

ये गेम नेगेटिव नहीं है जहाँ कोई अपनी सुपीरियरटी दिखा के लोगो को हार्म करना चाहता है. बल्कि ये एक अच्छी गेम है जहाँ कोई इन्सान उन लोगो के थ्रू भलाई करने की कोशिश करता है जिन पर वो ट्रस्ट करता है. 

जैसेकि एक आदमी जो रीसेंटली प्रेजिडेंट बना है, वो कसम खाता है कि वो अपने लोगो को एक बेस्ट पोलिटिशियन और एक अच्छा इन्सान बन के दिखायेगा. वो अपने लोगो के लिए सब अच्छा ही करेगा, उनकी प्रोब्लम्स सोल्व करने की कोशिश करेगा, उनकी बात सुनेगा. ताकि उन लोगो को इस बात की ख़ुशी हो कि वो अपने प्रेजिडेंट को जानते है. 

कनक्ल्यूजन (Conclusion)

इस बुक से हम क्या सीखेंगे? 

एक बात तो एकदम क्लियर है कि लाइफ में गेम्स खेलना बहुत ज़रूरी नहीं है. हालाँकि इनका हमारी लाइफ में थोडा बहुत पार्ट है. लेकिन जो चीज़ सबसे ज्यादा मैटर करती है वो ये है कि हम अपनी लाइफ में जितना हो सके उतना पोजिटिव रहे और हर हाल में दूसरो और अपनी लाइफ के साथ गेम खेलने से बचे. स्पेशली ऐसे गेम्स जो डिस्ट्रक्टिव होते है और हमे हार्म कर सकते है. और अगर आपको गेम्स खेलने ही है, तो सेफ वे में खेलो ताकि किसी को तकलीफ ना हो.

हमने इस बुक समरी से ये भी सीखा कि जितना हम सोचते है लाइफ उससे कहीं बढकर है. जितना हम खुद का ध्यान रखते है, अपने बारे में सोचते है उतना ही हमे दूसरो का ख्याल भी रखना चाहिए. आपको स्ट्रोंग और ऑनेस्ट तो बनना पड़ेगा साथ ही लोग जो गेम्स खेलते है उसे भी समझना पड़ेगा उसके बाद ही आप डिसाइड करो कि आपकी कैसी लाइफ चाहते है, गेम्स के साथ या इसके बगैर? 

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