GRINDING IT OUT-The Making Of Mcdonald’s Hindi Summary

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By : Ray Kroc

---------- About Book ----------

आपको ये समरी क्यों पढ़नी चाहिए?

क्या आप अपने फेवरेट फास्ट- फ़ूड  रेस्टॉरंट की कामयाबी की कहानी जानना चाहते हैं? क्या आप यकीन करेंगे कि McDonald’s का हर एक इंग्रेडिएंट के लिए एक स्ट्रिक्ट प्रोटोकॉल है? वे अपने टेस्टी फ्राइस में टेस्ट लाने के लिए अपने फ्राइस को पंखे की हवा लगाते हैं. इस समरी में आप जानेंगे कि क्यों McDonald’s हर किसी की पसंदीदा फास्ट- फ़ूड  चेन है. आप जानेंगे कि कुछ बहुत बड़ा बनाने के लिए कितने पैशन और कमिटमेंट की ज़रूरत पड़ती हैं. 

ये समरी किसे पढ़नी चाहिए?

• छोटे और मीडियम साइज़ के बिज़नस ओनर्स 

• बिज़नस स्टूडेंट्स 

• जो लोग अपने बिज़नस को बढ़ाना  चाहते हैं

ऑथर के बारे में

रे क्रॉक एक अमेरिकन बिज़नसमैन थे. उन्होंने 1961 में McDonald’s को खरीदा था और 6 साल तक इसके CEO के तौर पर काम करते रहे. आज हम जिस McDonald’s को देखते हैं, जो एक ग्लोबल फ़ूड एम्पायर बन चुका है, उसके पीछे रे का हाथ है.

---------- Summary ----------

GRINDING IT OUT-The Making Of Mcdonald’s

इंट्रोडक्शन 

इसमें कोई शक नहीं कि आप, McDonald’s,  फ़ूड  चेन रेस्टॉरंट के बारे में ज़रूर जानते होंगे. लगभग हर शहर में McDonald’s के चेन हैं. ये मज़ेदार खाने के साथ साथ फ़ास्ट सर्विस के लिए भी जाने जाते हैं. आजकल बहुत सारे फ़ूड चेन खुल गए हैं लेकिन McDonald’s की बात हमेशा से कुछ अलग रही हैं. इस समरी में आप इसी बारे में जानेंगे. 

आप सीखेंगे कि McDonald’s कैसे बना. हालांकि इसे  McDonald  भाइयों ने मिलकर बनाया, लेकिन रे क्रॉक ने McDonald’s को बदला. और इसे वो शक्ल दी जिसे आप और हम आजकल देखते हैं.

आप जानेंगे कि कामयाबी आसानी से नहीं मिलती है. कामयाबी अपने साथ बहुत सारी प्रॉब्लम्स लेकर आती है. लेकिन आप सीखेंगे कि रे ने नाकामी और कामयाबी दोनों को कैसे संभाला.

इस समरी में, आप जानेंगे कि आपके पसंदीदा McDonald’s में मिलने वाले मज़ेदार खाने को परोसने के पीछे कितनी मेहनत की जाती हैं. 

रे क्रॉक की ज़िंदगी मुश्किलों से भरी थी. वे एक मल्टी- मिलियनेयर के तौर पर जाने जाते हैं लेकिन इसके लिए उन्होंने काफी स्ट्रगल किया. आपके इनफार्मेशन के लिए बता दें कि रे को McDonald’s के ट्रांसफॉर्मेशन, उसके बदलाव के लिए जाना जाता हैं. उन्होंने ही इसे फ़ूड एम्पायर बनाया जो ये आज है. लेकिन रे ने रातों-रात ये कामयाबी हासिल नहीं की. McDonald’s से पहले, रे पेपर कप बेचते थे. ऐसा उन्होंने लगातार 17 सालों तक किया. उनकी सैलरी उनके फैमिली को चलाने के लिए काफी नहीं थी. फिर, रे ने पियानो भी बजाकर हालात को बेहतर करने की कोशिश की. 

हालांकि रे ने अपनी ज़िंदगी से कोई शिकायत नहीं की. वो जानते थे कि स्ट्रगल करना तो सक्सेस पाने का एक हिस्सा है. वो हमेशा आगे बढ़ने के मौकों की तलाश में रहते थे. 1954 में रे ने मल्टी मिक्सर के बारे में सुना. ये एक शेक मशीन थी जिसे हाल ही में लॉन्च किया गया था. इसमें छह स्पिंडल थे, और ये महंगा था. रे को इसके बारे में जानकार कुछ अच्छा महसूस हुआ था. और इसलिए, उन्होंने मल्टीमिक्सर के सेल्समैन बनने के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी. ये एक रिस्की कदम था. रे की पत्नी को विश्वास नहीं हो रहा था कि रे ने ऐसा कुछ किया हैं. लेकिन रे को लग रहा था कि उनके साथ अब कुछ अच्छा होने वाला हैं. 

उनके मन की बात वाकई में सच निकली. रे को पूरे स्टेट से कई बायर्स के कॉल आए. उनमें से एक थे  ऑरेगन   के एक रेस्टॉरंट के मालिक. एक दूसरा बायर था एरिज़ोना में सोडा फाउंटेन ऑपरेटर. वे सभी मल्टी मिक्सर खरीदना चाहते थे. कॉल करने वालों ने बताया कि मशीन का इस्तेमाल McDonald ब्रदर्स करते हैं. जाहिर है,  McDonald  भाइयों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली कोई भी चीज एक अच्छी इन्वेस्टमेंट थी. 

रे के अंदर बेचैनी जागी. उन्हें जानना था कि आखिर ये McDonald भाई कौन थे? वे बिज़नस फील्ड में आखिर क्यों मशहूर थे? रे की बेचैनी तब बढ़ी जब उन्हें पता चला कि इन भाइयों के पास 8 मल्टी मिक्सर हैं. ये एक बड़ी बात थी क्योंकि मशीन काफी महंगी थी. इसलिए, रे ने अपने सवालों का जवाब ढूंढ़ने के लिए, लॉस एंजिल्स की फ्लाइट ली. वो   McDonald  भाइयों को ढूंढ़ने सैन बर्नार्डिनो गए थे.

पहले तो, रे  McDonald  भाइयों की बिल्डिंग से इम्प्रेस नहीं हुए. ये एक मामूली बिल्डिंग थी जिसकी पार्किंग भी बड़ी ही मामूली थी. इसमें कुछ खास इंटरेस्टिंग बात नहीं थी. हालांकि, रे को जल्दी ही पता चल गया कि बायर्स हर बार रे के साथ बात करते हुए इन  McDonald  भाइयों का ज़िक्र क्यों करते थे. McDonald’s के खुलते ही कस्टमर्स का आना शुरू हो गया. कस्टमर्स की तादाद इतनी ज़्यादा थी कि रे को अब कोई हैरानी नहीं थी कि उनके पास 8 मल्टीमिक्सर क्यों थे.

रे ने कुछ कस्टमर्स से कांटेक्ट किया और कैज़ुअल बातचीत की. एक कस्टमर ने कहा कि वो अक्सर वहां आता हैं. खाना सस्ता, टेस्टी और सर्विस बहुत तेज थी. एक दूसरे कस्टमर ने भी ठीक यही बात कही. रे इससे काफी इम्प्रेस हो गए. रे ने वहां जिस कस्टमर को भी देखा, साफ़ ज़ाहिर हो रहा था कि वे अपना खाना एन्जॉय कर रहे थे. लेकिन रे का दिमाग वहां के ओवरड्राइव पर था. रे को लगा कि इस बिज़नस में काफी पोटेंशियल हैं.

उस दिन शाम को रे दोनों  McDonald  भाइयों -मैक और डिक से मिले. वे रे को जानते थे क्योंकि रे मल्टीमिक्सर बेचने की वजह से पॉपुलर थे. उन्होंने रात का खाना साथ खाया, और  McDonald’s के बारे में बात की. हैरानी की बात थी कि McDonald’s का सिस्टम सिंपल और एफ्फिसिएंट था. उन दिनों, McDonald’s का मेन्यू काफ़ी लिमिटेड था. वे सिर्फ बर्गर, फ्राईस और ड्रिंक्स बेचते थे. जैसे-जैसे वे आपस में बात करते गए, रे और भी एक्साइटेड होते गए. वो पहले से ही अपने दिमाग में एक प्लान बनाने लगे थे. लेकिन पहले, उन्हें ये देखना था कि McDonald’s डेली कैसे ऑपरेट होता है.

अगले दिन रे ने McDonald’s के एम्पलॉईस को देखा. वे अपने एक्शन में परफेक्ट थे. खाने की तैयारी, खाना बनाना और साफ-सफाई करना उनके लिए जैसे बाएं हाथ का खेल हों. वे एक ऐसी मशीन की तरह काम कर रहे थे जिसमें तेल डाला गया हो. ये देखकर रे ने डील को फाइनल किया. उन्होंने मैक और डिक से कांटेक्ट किया और अपना प्लान बताया. 

रे के साथ,  McDonald  भाई पूरे देश में कई सारे फ्रेंचाइजी खोल सकते थे. इससे उनके और रे के पास भी बहुत सारे पैसे आएँगे. McDonald’s की हर फ्रैंचाइज़ी में मल्टी मिक्सर बेचने के लिए रे को बहुत पैसा मिलेगा.

लेकिन  McDonald  भाई इसमें हिचकिचा रहे थे. वे बिज़नस वेंचर के साथ आने वाली प्रॉब्लम्स का सामना नहीं करना चाहते थे. आखिर ये परेशानी भरा काम  था. रे ने पुरे भरोसे के साथ कहा कि वो ही इस बिज़नस वेंचर को एक हकीकत बनाने की ज़िम्मेदारी लेंगे.

आसमान में बादल छाए थे, जब रे अपने घर वापस लौटे. उनके सूटकेस के अंदर एक कॉट्रैक्ट था जिस पर  McDonald  भाइयों ने सिग्नेचर किए थे. रे बहुत खुश हुए. वो एक बूढ़े शख्स थे- 52 साल के, लेकिन उन्हें ऐसा लगा जैसे वे फिर से जवान हो गए है. ये बिज़नेस ऑपर्चुनिटी उनके करियर और ज़िंदगी दोनों को बदल सकती थी.

अपनी उम्र के ज़्यादातर लोगों की ही तरह, रे भी कई हेल्थ प्रॉब्लम से जूझ रहे थे. उन्हें डायबिटीज़ और आर्थराइटिस था. उन्हें गॉल ब्लैडर और थायरॉइड ग्लैंड की प्रॉब्लम भी थी. लेकिन रे को एक बार भी नहीं लगा कि उम्र और इसके कॉम्प्लीकेशन उन्हें रोक सकेंगे. वो अभी भी आगे बढ़ रहे थे और सीख रहे थे. 

रे बचपन से ही सपने देखने वाले शख्स थे. उन्हें दिन में सपने देखना पसंद था क्योंकि ये उनके काम का फाउंडेशन था. मिसाल के तौर पर, उन्होंने नींबू पानी स्टैंड का सपना देखा, और रे को नींबू पानी बेचने में ज्यादा टाइम समय नहीं लगा था. इसके लिए उन्हें काफी पैसे भी मिले थे. रे ने बड़े होकर एक ऐसे शख्स बनने का सपना देखा, जो अपनी फील्ड में कामयाब हो. इसलिए, उन्होंने कई गर्मियों की छुट्टी में काम करते. वो सीखना और आगे बढ़ना चाहते थे. 

लेकिन, रे स्कूल के लिए नहीं बने थे. अपने सेकंड ईयर में ही वे हाई स्कूल से बाहर हो गए. वो असली दुनिया का हिस्सा बनना चाहते थे. वो पैसा कमाने के लिए बेताब थे. रे को जल्दी ही पता चला कि उनमें लोगों को मनाने और उनसे सामान खरीदवाने का टैलेंट है. सबसे पहले, उन्होंने कपड़ों में सिलने वाले रिबन बेचे. रे को इससे कुछ लॉयल कस्टमर मिले. लेकिन रे ने इसमें हार मान ली. वो जानते थे कि उनकी कामयाबी कहीं और है. फिर, वो पास के एक होटल के एक बैंड में शामिल हो गए.

इन सालों में, रे ने हर तरह की जॉब्स कीं. उन्होंने खुद को बांधकर नहीं रखा. वो अलग-अलग फील्ड में काम करते चले गए और अपने बॉस, और कलीग्स से काफी कुछ सीखा. उनका सबसे लंबा जॉब था पेपर कप बेचना. ये सब आसान नहीं था. रे को कामयाबी से ज्यादा मुसीबतें मिली. ऐसे दिन भी थे जब उन्हें हार मानने की इच्छा होती. ऐसे दिन भी थे जब वो एक भी सेल्स नहीं कर पाए थे. लेकिन रे रुके नहीं. उन्होंने खुद से कहा कि एक टाइम में सिर्फ एक चीज की चिंता करनी चाहिए. सोने से पहले वे रिलैक्सेशन टेक्निक का भी इस्तेमाल करते थे.

हर महान चीज की तरह, McDonald’s की शुरुआत भी मामूली सी थी. 1932 में, मैक और डिक अपनी जरूरतों तक को पूरा करने के लिए स्ट्रगल कर रहे थे. उन्होंने प्रॉफिट कमाने की उम्मीद में एक पुराना मूवी थियेटर खरीदा. ये एक अच्छा बिज़नस वेंचर नहीं था. मैक और डिक अक्सर दिन में सिर्फ एक बार का खाना खा पाते थे. अक्सर उनका खाना होता था उनके थिएटर के पास के एक स्टैंड का हॉटडॉग. इसी हॉटडॉग स्टैंड ने उन्हें फ़ूड इंडस्ट्री में आने का आईडिया दिया था. 

1937 में, मैक और डिक ड्राइव-इन  फ़ूड  सर्विस शुरू करने में कामयाब रहे. ये बहुत हिट हुई थी. लेकिन उन्होंने इसे सेकंड वर्ल्ड वॉर के दौरान बंद कर दिया था. 1948 में जब उन्होंने फिर रेस्टॉरंट खोला तो वो बिल्कुल अलग था. वे सिर्फ सिंपल खाना सर्व करते थे: बर्गर, फ्राईस और ड्रिंक्स. मेन्यू में जो कुछ भी कॉम्प्लिकेटेड था, वो सब हटा दिया था. बहुत सारे कस्टमर्स McDonald’s की तरफ खींचे चले आते थे. मेन्यू सिंपल रखा गया था ताकि हर इंग्रेडिएंट की क्वालिटी पर नज़र रखी जा सकें.

स्टेट में कई सारे McDonald’s खोलने के लिए रे बहुत ही एक्साइटेड थे. उन्होंने और  McDonald  भाइयों ने वकीलों के सामने कॉन्ट्रैक्ट के बारे में बात की. उन्होंने फ्रेंचाइजी से रे को मिलने वाले परसेंटेज पर भी डिसकस किया. दोनों भाइयों ने इस बात पर ज़ोर डाला कि नए McDonald’s में उनके पहले McDonald’s की हर डिटेल और गाइडलाइन को फॉलो किया जाए. ऐसा इसलिए ताकि McDonald’s की क्वालिटी ज़रा भी खराब न हो. अगर रे को कोई भी बदलाव करना हो, तो उन्हें दोनों भाइयों के  lawyer को दिखाने के लिए इसे लिखना पड़ेगा. रे फ़ौरन मान गए और McDonald’s के साथ 10 साल का कॉन्ट्रैक्ट पर सिग्नेचर किया.

लेकिन रे को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा. सबसे पहले, उनके लिए हर आर्किटेक्चर इंस्ट्रक्शन को फॉलो करना नामुमकिन था. भाइयों ने जो डिज़ाइन अपनाया था, वो एक आधे-रेगिस्तानी जगह के लिए था. रे शिकागो के अर्बन एरिया में थे. मैन डिजाइन में कोई बेसमेंट नहीं बना था, लेकिन रे को एक बेसमेंट की जरूरत थी. इसलिए उन्होंने भाइयों को बुलावाया. भाइयों ने रे को बेसमेंट बनाने की इज़ाज़त दे दी. रे ने उन्हें लीगल डाक्यूमेंट्स की याद दिलाई जो उन्हें लिखकर जमा करना था. लेकिन भाइयों ने कहा कि ये ज़रूरी नहीं हैं. वे बाद में भी लीगल पेपरवर्क कर सकते थे.

ये बार-बार की प्रॉब्लम बन गई थी. रे चाहते थे कि दोनों भाई उनके किए गए बदलाव को लिखकर माने कि उन्होंने इन बदलावों की इज़ाज़त दे दी हैं. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. भाइयों ने कहा कि उनके पास ऐसा करने के लिए कोई सेक्रेटरी नहीं है. रे को लगा कि ये भाई उम्मीद कर रहे थे कि रे नाकाम हो जाएंगे और हार मान लेंगे. रे के लिए ये फ़्रस्ट्रेटिंग था. उनके बिज़न पार्टनर्स को-ऑपरेट नहीं कर रहे थे. लेकिन रे पीछे नहीं हटे.

रे अपनी पहली फ्रैंचाइज़ी को चलाने में कामयाब रहे. हालांकि, ये काम उन्होंने अकेले ने नहीं किया. उन्होंने अपनी मदद के लिए कई जानने वालों को कांटेक्ट किया था. रे का फ्रैंचाइज़ी भी उन्हीं  McDonald  भाइयों की तरह कामयाब रहा था.

लेकिन एक और प्रॉब्लम थी जिसे हल करने में रे को काफी परेशानी हुई थी. ये प्रॉब्लम फ्रेंच फ्राईस के साथ जुड़ा था. रे आसानी से अपने फ्रैंचाइज़ी में फ्रेंच फ्राईस बेच सकते थे. लेकिन वो ऐसा नहीं कर सके. वो  चाहते थे कि उनके फ्रेंच फ्राईस भी उन दो भाइयों के McDonald’s की तरह टेस्टी हों. इसलिए, टेस्ट और टेक्सचर को ठीक करने के लिए उन्होंने बहुत कोशिश की.

रे को नहीं समझ नही आ रही थी कि वो क्या गलत कर रहे हैं. उन्होंने फ्राईस बनाने के प्रिपरेशन और कुकिंग प्रोसेस को याद कर लिया था. उन्होंने  McDonald  भाइयों को गाइडेंस के लिए बुलाया. रे ने अपने यहाँ बनने वाले फ्रेंच फ्राईस के तरीके के बारे में बताया. लेकिन दोनों भाइयों को भी प्रॉब्लम नहीं समझ आई थी.

इसके बाद, रे ने आलू और प्याज एसोसिएशन को बुलाया. वे घंटों फोन पर इसके बारे में बात करते. आखिर में इस एसोसिएशन ने इसका सोल्यूशन निकाला. रे को फ्रेंच फ्राईस बाहर हवा में रखना होगा. ऐसा करने पर, इसने आलू को टेस्टी बना दिया था. इसलिए रे ने अपने बेसमेंट में बड़े पंखे लगवाए.

रे ने अपने फ्रेंचाइजी के लिए अनगिनत काम किए, उनमें से ये एक था. उन्होंने ये पक्का किया कि उनके फ्रेंचाइजी में सब कुछ  McDonald  भाइयों के बिज़नस के बराबर हो. पहले, रे इसमें मल्टीमिक्सर्स की सेल्स के लिए आए थे. लेकिन जल्द ही, रे को एहसास हुआ कि वो फ़ूड इंडस्ट्री के लिए कितने पैशनेट हैं. खासतौर से, वे McDonald’s के लिए बहुत पैशनेट थे.

रे की McDonald’s की फ्रेंचाइजी अच्छी चल रही थी. लेकिन, ये उन कर्ज़ों को चुकाने के लिए काफी नहीं थे जो उन्होंने इन सालों में लिए थे. रे को और फ्रैंचाइजी खड़ी करने की जरूरत थी. लेकिन ये कहना आसान था, करना नहीं. वो दूसरे लोगों को काम पर रखने के लिए अफ़्फोर्ड नहीं कर सकते थे. किसी को रे की ऑफिस संभालने की जरूरत थी क्योंकि वो  अभी भी मल्टीमिक्सर बेच रहे थे. किसी को उनकी McDonald’s फ्रैंचाइज़ी को भी मैनेज करना था. रे ये सब अपने आप नहीं कर सकते थे. उन्होंने आगे आने वाले फ्रैंचाइज़ी को चलाने के लिए भी रास्ता बनाना शुरू किया. 

रे ने धीरे-धीरे McDonald’s को आज के इस McDonald’s में बदलना शुरू कर दिया, जैसा आज आप और हम इसको जानते हैं. उन दिनों रेस्टॉरंट में लाउड म्यूजिक का ट्रेंड था. लेकिन रे ने ज्यूकबॉक्स को अपने रेस्टॉरंट के अंदर नहीं आने दिया. उन्होंने वेंडिंग मशीनों को भी परमिशन नहीं दी. उन्होंने सोचा कि ज्यूकबॉक्स और वेंडिंग मशीन से कस्टमर्स और एम्पलॉईस का ध्यान इधर-उधर भटकेगा. रे McDonald’s की फैमिली रेस्टॉरंट की इमेज को बनाए रखना चाहते थे.

धीरे-धीरे ही सही लेकिन रे ने 1956 में McDonald’s की आठ फ्रेंचाइजी खोली. तब तक, उनके पास हर ब्रांच को मैनेज करने वाले लोग भी हो गए थे. हर फ्रेंचाइजी की अपनी अलग ही प्रॉब्लम थी. किसी फ्रैंचाइज़ी को मीट सप्लायर की प्रॉब्लम थी. दूसरे को लोकेशन की प्रॉब्लम थी. इनको सुलझाना थका देने वाला काम था. लेकिन रे ने कभी काम करना बंद नहीं किया. वो रुकते भी क्यों, आखिर ये उनके लिए एक बहुत बड़ा ब्रेक था.

McDonald’s ज़्यादा और ज़्यादा पॉपुलर हो रहा था. रे इससे बहुत खुश थे. लेकिन रे के मन में एक गोल था. वो चाहते थे कि McDonald’s एक ऐसा रेस्टॉरंट बने जो अपने ऑपरेटिंग सिस्टम के लिए भी जाना जाए. वो चाहते थे कि McDonald’s अपने क्वालिटी, खाने का प्रिपरेशन और प्रेजेंटेशन को हमेशा एक जैसा कंसिस्टेंट बनाए रखे. रे ने हज़ारों ऐसे McDonald’s का ख्वाब देखा जिनकी क्वालिटी वैसे ही शानदार रहे.

 इसमें बहुत टाइम और पैसा लगेगा. रे जानते थे कि उन्हें सप्लायर्स, ऑपरेशन्स और एम्पलॉईस को एक ही जैसा ट्रैन करना पड़ेगा. उनके बिज़नस की कामयाबी के लिए बहुत ज़रूरी था कि सब फ्रेंचाइजी एक जैसे ही काम करें. और, तभी QSC and V की शुरुवात हुई. आज तक, McDonald’s में इन कोर प्रिंसिपल्स को इम्पोर्टेन्ट माना जाता हैं: quality, service, cleanliness  यानी सफ़ाई ,हाइजीन और value.

1957 में, McDonald’s की पूरे देश में 25 फ्रेंचाइजी हो गई थी. फ्रैंचाइज़ी ऑपरेशन में और भी लोग शामिल हुए. एक थे फ्रेड टर्नर जो कॉर्पोरेट साइड को संभालते थे.  फ्रेड 23 साल के थे जब वो और रे पहली बार मिले थे. हालाँकि वो यंग थे लेकिन रे उनसे काफी इम्प्रेस हुए थे. फ्रेड एक नेचरल लीडर थे. McDonald’s फ्रेड के लीडरशिप के बगैर वो नहीं होता जो वो आज हैं. बाद में जाकर फ्रेड McDonald’s के बोर्ड के प्रेसीडेंट बने थे और आखिर में चेयरमैन भी बने.

जिम शिंडलर और सिग चाको भी थे. ये फ्रेंचाइजी के ग्रैंड ओपनिंग से पहले इक्विपमेंट को तैयार करते थे. जब हेल्थ डिपार्टमेंट इनके लिए प्रॉब्लम बनी, तो सिग ने एक हल निकाला. हेल्थ डिपार्टमेंट को चिंता थी कि एक कमरे में मिल्कशेक और बर्गर बनाना "गंदा" था. अब, जो भी हाल के McDonald’s थे, उनके डिजाइन में फेरबदल या चेंज करना काफी महंगा होता इसलिए सिग ने सुझाया कि एक ग्लास पार्टीशन बनाया जाए. 

McDonald’s ने एक रेपुटेड रेस्टॉरंट चेन के तौर पर खुद को रातों-रात ही नहीं बनाया था. इसे अलग-अलग लोगों ने कई बार आकर इसमें बदलाव किए थे. इन सालों में लगातार बदलाव करने से ही ये फ़ूड इंडस्ट्री में इतना बड़ा नाम बन पाया हैं. 

फ़्रेड टर्नर पर दोबारा लौटते हैं. भले ही वो अभी बहुत यंग थे, लेकिन रे ने उन्हें बड़ी-बड़ी ज़िम्मेदारियाँ सौंप दीं थी. सालों से सेल्समैन रहने की वजह से रे का अंदाज़ा काफी अच्छा हो गया था. वो इतना जानते थे कि फ्रेड को जो कुछ भी दिया जाए, वो उसे संभाल सकते हैं. जब भी McDonald’s हैमबर्गर बन्स की बात आती है तो उसमें फ्रेड की काबिलियत दिखती हैं. 

आप सोच सकते हैं, "इन बन में ऐसा क्या खास है?" McDonald’s के लिए, ये सब कुछ है. जैसा कि हम पहले ही जान चुके हैं, McDonald’s का एक लिमिटेड मेन्यू था. उन्होंने ये पक्का किया कि इसके सारे इंग्रेडिएंट्स बहुत ही हाई क्वालिटी के हो. अगर आप नाम कमाना चाहते हैं, तो आपको हर छोटी-छोटी बातों को ध्यान में रखना होगा. और, फ्रेड ने यही किया।

रे ने बन्स का इंतज़ाम मिडवेस्ट के एक सप्लायर से किया. इनके सप्लाई के बंस झुण्ड में होते थे. मतलब, चार से छह बन आपस में चिपके हुए होते थे. फ्रेड ने कहा कि ऐसे बंस काम में अड़चन डालेंगे. स्टाफ के लोग हर बन को काटने में टाइम बर्बाद करेंगे. इसलिए, फ्रेड ने अपने सप्लायर से बन्स को झुण्ड में न देने के लिए कहा.

इन छोटे-छोटे बदलावों से किचन में टाइम की काफी बचत हुई. इससे काफी पैसा भी बच गया. स्टाफ के लोग भी ज़्यादा एफ्फिसिएंट, बेहतर काम करने वाले बन गए थे. McDonald’s की वजह से उनके बन सप्लायर को भी बहुत ज़्यादा कस्टमर्स मिले. एक फेमस रेस्टॉरंट के जैसे बन्स कौन नहीं लेना चाहेगा?

McDonald’s की कामयाबी एक मुश्किल रास्ता था. बहुत सारे लोगों ने मेन्यू का मजाक उड़ाया था. उनके पास पहले से ही बहुत सारे कस्टमर्स थे, क्यों न इसको और भी फैलाया जाए? लेकिन रे ने लोगों की बात नहीं सुनी. वो जानते थे कि छोटे-छोटे डिटेल्स पर काम करने से जबरदस्त रिजल्ट मिलेंगे. यही McDonald’s को एक फ़ूड एम्पायर बनाने की चाबी थी.

McDonald’s अच्छा बिज़नस कर रहा था. रे ने सोचा कि जो भी बुरा होना था, हो चूका. लेकिन, अफ़सोस, कि उनके प्रॉब्लम्स अभी शुरू हो रहे थे. क्लेम बोहर नाम का एक शख्स एक दिन रे के ऑफिस गया. उसने McDonald’s को दूसरे देशों में फैलाने के बारे में बात की. क्लेम ने दावा किया कि वो इसे हकीकत में बदल सकता है. रे आसानी से राजी हो गए. एक सेल्समैन के तौर पर उनका अंदाज़ा उन्हें बता रहा था कि क्लेम अपनी बात पर कायम रहेगा.

लेकिन अंदाज़ा या मन की आवाज़ हमेशा सही नहीं होती. क्लेम ने रे को धोखा दिया. उसने रे को और पैसे देने के बजाय और कर्ज दिया. जाहिर है, क्लेम McDonald’s को बनाने के लिए इस्तेमाल हुए प्रॉपर्टीज के पैसे नहीं दे रहा था. उन जगहों के मालिंक रे से पैसे की मांग कर रहे थे.

लेकिन, रे के पास पैसे नहीं थे. फ्रेंचाइजी से होने वाला प्रॉफिट रे के पॉकेट में नहीं आता था. इसका एक हिस्सा  McDonald  भाइयों के पास जाता था. इसका कुछ हिस्सा रे के एम्पलॉईस के पास जाता. रे के पास जो पैसा था, वो  सीधे उनके पिछले कर्ज़ों को चुकाने में चला गया. रे को समझ नहीं आ रहा था कि वो इस प्रॉब्लम से कैसे निकले.

लेकिन रे भूल गए थे कि वो अकेले नहीं हैं. उन्होंने अपने भरोसेमंद कलीग्स के साथ मिलकर एक प्लान तैयार किया. ये प्लान था अपने सप्लायर से क़र्ज़ मांगने का. अब तक, उनके सप्लायर भी बेहतर पोजीशन में थे. McDonald’s के आगे बढ़ने के साथ, वे भी आगे बढ़ पाए थे. उन्होंने एक दूसरे को ऊपर उठने में मदद की. डील्स किए गए और कॉन्ट्रैक्ट्स पर सिग्नेचर हुए. आखिर में, रे उस प्रॉब्लम को सुलझाने में कामयाब रहे, जिसे क्लेम ने McDonald’s के सामने लाकर खड़ी कर दी थी. ये नामुमकिन था अगर रे अपने साथ काम करने वालों की हेल्प नहीं लेते.

तभी एक और प्रॉब्लम रे के सामने आई. ये थे  McDonald  भाई. उन्होंने रे और उनके लोगों के लाए हुए बदलावों को मानने से इंकार कर दिया. रे ने कहा कि ये वक्त के साथ बदलने का एक तरीका था.

ज़्यादा से ज़्यादा रेस्टॉरंट चेन्स खुल रहे थे. इस कॉम्पिटिशन में रहने के लिए McDonald’s को सबसे ऊपर रहना चाहिए. लेकिन  McDonald  भाइयों ने रे की बात नहीं मानी. उनके लिए, नए प्रोटोकॉल सीखना ज़रूरी नहीं था. उनके हिसाब से उनका सिस्टम ठीक चल रहा था. एफ्फिसिएंट होना बहुत ज़रूरी नहीं था. इस तरह की सोच ने McDonald’s को सालों तक और आगे बढ़ने नहीं दिया. 

आखिर, रे ने  McDonald  भाइयों से अलग होने का फैसला लिया.  McDonald  भाई साथ नहीं दे रहे थे और आगे बढ़ने को तैयार नहीं थे. तो, रे ने पूछा कि वे McDonald’s को कितने में बेचेंगे. उन्होंने अपनी कीमत सामने रखी तो रे लगभग पीछे हट ही गए थे. ये बहुत ज्यादा की डिमांड थी. रे को आखिर 2.7 मिलियन डॉलर कहां से मिलते? लेकिन उन्होंने हार मानने से इनकार कर दिया. पिछली प्रॉब्लम्स की तरह, रे ने हेल्प के लिए अपने कलीग्स का साथ माँगा. 

उन्होंने जॉन ब्रिस्टल के साथ एक एग्रीमेंट करवाया. वो  अलग अलग फेमस इंस्टिट्यूट के फिनांशियल एडवाइजर थे. उनके क्लाइंट्स में से एक था प्रिंसटन यूनिवर्सिटी. जॉन ने कहा कि वो रे को कैश देंगे. हालांकि, रे को उन्हें इन पैसों को इंस्टॉलमेंट में वापस करना होगा. रे ने सोचा कि इसे चुकाने में उन्हें लगभग 20 साल लगेंगे. लेकिन वो जॉन ब्रिस्टल को 6 साल में पैसे लौटाने में कामयाब हुए.

आखिर में ,रे के पास McDonald’s आ ही गया था. बिज़नस बड़ा हो रहा था. ज़्यादा से ज़्यादा टैलेंटेड और स्किल वाले लोग इनके साथ काम करने आए.

कन्क्लूज़न 

आपने सीखा कि कामयाबी एक बड़ी कीमत चुकाने पर मिलती हैं. अगर आप कुछ यादगार बनाना चाहते हैं, तो आपको उसके लिए कोशिश करनी होगी.

आपने रे क्रॉक के ज़िंदगी के बारे में जाना. उन्होंने सालों तक स्ट्रगल किया. 52 साल की उम्र तक उनके पास McDonald’s नहीं था. लेकिन अगर आप कामयाबी तक पहुंचना चाहते हैं, तो इसमें उम्र कभी रास्ते में नहीं आता.

 आपने सीखा कि अलग-अलग फील्ड को आजमाना ठीक है. रे ने कभी खुद को फ़ूड इंडस्ट्री में काम करने का सोचा नहीं था. उन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी एक सेल्समैन के तौर पर गुज़ारी न की एक रेस्टॉरंट चेन को चलाते हुए. लेकिन रे ने खुद को बांधकर नहीं रखा और इसी हौसले की वजह से वो आगे बढ़ पाए.

आपने McDonald’s की मामूली सी शुरुआत के बारे में जाना.  McDonald  भाइयों ने हॉट डॉग स्टैंड से इंस्पिरेशन ली थी. उन्होंने एक धीमी शुरुवात की थी. उनके पास सिर्फ एक लिमिटेड मेन्यू था ताकि वे हर इंग्रेडिएंट की क्वालिटी अच्छी रख सकें. 

आपने McDonald’s को फ़ूड एम्पायर बनाने के लिए रे के डेडिकेशन के बारे में भी जाना. अपने कलीग्स के साथ, उन्होंने हर छोटी-छोटी डिटेल का ध्यान रखा. उन्होंने ये देखा कि हर इंग्रेडिएंट सही तरीके से पकाई गई हो. बाद में, उन्होंने एक ऑपरेटिंग सिस्टम बनाया जिसे McDonald’s अब तक यूज़ करता है. वे रेस्टॉरंट के कोर प्रिंसिपल को मानते हैं- quality, service, cleanliness और value.

आपने सीखा कि छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देने से अच्छे रिजल्ट मिल सकते हैं. McDonald’s को आज का फ़ूड एम्पायर बनाने के पीछे हैं नपा-तुला कदम लेना.

अब आप जान चुके हैं कि McDonald’s को आज के जैसा बनने के पीछे किन-किन बातों का हाथ हैं. बहुत सारे लोगों ने इस रेस्टॉरंट चेन को इसकी ऊंचाई तक पहुंचाने में अपना सबकुछ लगा दिया. कामयाबी रातोंरात नहीं मिलती. कभी-कभार कामयाबी ऐसे जगहों से भी मिलती हैं जहां से आपको उम्मीद न हो. अपने आप को मत रोको. अलग-अलग फील्ड में खुद को आजमाओ. क्या पता चलते-चलते आपको रास्ते में कहीं अपने खुद का McDonald’s मिल जाए. 

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