Start with Why by Simon Sinek Hindi Summary

Start with Why by Simon Sinek Hindi Summary

Start with Why by Simon Sinek  Hindi Summary

---------- About Book ----------

स्टार्ट विथ व्हाई का मतलब है किसी मकसद के साथ शुरू करना. लोग कोई प्रोडक्ट अच्छे फीचर्स या उसे बनाने के मुश्किल मेथड को देख क नहीं खरीदते हैं. सवाल ये है कि आपकी कंपनी कस्टमर के लिए क्या कर सकती है और आपका प्रोडक्ट उनके लिए क्या मायने रखता है. अगर आप अपना बिज़नेस पॉपुलर और बढ़ाना चाहते हैं, तो ये बुक ज़रूर पढ़ें.

यह बुक किसे पढनी चाहिये

नए बिज़नेस ओनर्स, प्रोडक्ट बनाने वाले, मार्केटिंग स्टाफ, बिजनेसमैन बनने की इच्छा रखने वाले. 

आथँऱ के बारे में 

साइमन सिनेक  एक फेमस मोटिवेशनल स्पीकर  और ऑथर हैं. उन्हें TEDx और UN लीडर्स समिट में बोलने के लिए इन्वाइट  किया गया था. उन्होंने बिज़नेस  और आर्गेनाइजेशन के बारे में 5 बुक्स लिखी हैं.

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Start with Why by Simon Sinek  Hindi Summary

परिचय 

क्यों से शुरुवात की मतलब है कि किसी भी काम को लेकर हम एक पर्पज के साथ आगे बढे. आपने कंपनी क्यों शुरू की थी ? लीडर क्यों बनना चाहते है आप? क्या जिंदगी में आपका कोई पर्पज है, अगर है तो क्या? ये सब सवाल फ़िज़ूल नहीं है, आपको ये बहुत काम के लगेंगे जब आपको पता चलेगा कि कई मल्टी-मिलियन कंपनीयां इसीलिए सक्सेसफुल हो पाई क्योंकि वे एक ख़ास पर्पज के लिए बनाई गयी थी. उन्होंने अपनी शुरुवात व्हाई के साथ की..

इस किताब का सब-टाइटल है “ कैसे ग्रेट लीडर्स ने लोगो को एक्शन लेने के लिए इंस्पायर किया” ग्रेट लीडर्स से हमारा मतलब सिर्फ उनसे नहीं है जो पोलिटिक्स में है बल्कि उन सबसे है जो किसी भी इंडस्ट्री की बड़ी बड़ी कंपनीयों में बड़ी पोस्ट पर होते है. एप्पल एक लीडिंग कंप्यूटर ब्रांड है लेकिन बाद में ये मोबाइल और छोटे इलेक्ट्रोनिक्स इंडस्ट्री में भी उतर गया. क्यों ? इसके बारे में हम बाद में जानेगे. लोगो को एक्शन के लिए इंस्पायर करना” यही ग्रेट लीडरो का काम होता है. एक अच्छा लीडर ना सिर्फ लोगो का वोट हासिल करता है बल्कि उन्हें इंस्पायर भी करता है. ठीक वैसे ही लीडिंग कंपनीज़ भी लोगो को अपना कस्टमर बनाती है और साथ ही उन्हें इंस्पायर भी करती है. 

ग्रेट लीडर्स के कई लोयल फोलोवेर्स होते जो उनके लिए किसी भी तरह का सेक्रीफाइस करने के लिए हमेशा तैयार रहती है फिर चाहे कोई भी रास्ता क्यों न अपनाना पड़े. फॉलोवर्स अपने लीडर की इसलिए सुनते है क्योंकि वो उन्हें इंस्पायर करता है. हर सक्सेसफुल कंपनी के अपने लॉयल कस्टमर होते है. कम्पटीटर भले ही उससे बेहतर और नया प्रोडक्ट निकाल ले मगर कस्टमर इतनी जल्दी उसे नहीं खरीदते. वे अपनी पसंदीदा कंपनी और ब्रांड के लिए लॉयल रहते है. तो ऐसा कैसे हुआ ? कैसे उस कंपनी ने इतने लॉयल कस्टमर बनाये. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उस कंपनी ने व्हाई के पर्पज के साथ शुरुवात की थी. 

मेनीपुलेशन बनाम इंस्पायरेशन 

मोटोरोला ने अपना फ्लिप टॉप फ़ोन मॉडल रेज़र 2004 में निकाला था. कई हौलीवुड सेलेब्रीटीज़ और प्राइम मिनिस्टर ने भी ये नया फ़ोन खरीदा. मोटोरोला के लिए ये बहुत बड़ी सक्सेस थी. कुल मिलकर उन्होंने रेज़र के 50 मिलियन यूनिट्स बेचे.  हालांकि 4 साल में ही कोम्प्टीटर्स ने रेज़र की नकल वाले कई नये फ़ोन मार्किट में उतार दिए थे और भी बढ़िया फीचर के साथ तो मोटोरोला की चमक फीकी पड़ गयी. ये इसलिए हुआ क्योंकि कंपनी ने इंस्पिरेशन के बदले मेनीपुलेशन इस्तेमाल किया तभी इसने अपने सारे कस्टमर खो दिए. इसमें कोई लोयालिटी वाली बात नहीं थी. मोटोरोला ने नया प्रोडक्ट निकाला, लोगो को पसंद आया तो लोगो ने खरीदा मगर किसी और ने जब बेहतर प्रोडक्ट बनाया तो कस्टमर उसकी तरफ खिंच गए. अब अगर मोटोरोला ने लॉयल कस्टमर बनाये होते तो वे सिर्फ मोटोरोला के ही प्रोडक्ट खरीदते. 

जो मोटोरोला ने रेज़र के साथ किया वो सिर्फ एक नोवेल्टी थी एक तरह का मेनीपुलेशन. मगर लॉयल्टी पाने के लिए कुछ बड़ा सोचना पड़ता है. लोगो को इंस्पायर करना इतना आसान नहीं है. जब आप लोगो को मेनीपुलेट करोगे तो वे बस थोड़े से वक्त के लिए ही आपको फॉलो करेंगे. आप भले ही उनसे काम निकलवा ले मगर उनकी लॉयल्टी हासिल नहीं कर सकते है. और कोई भी ग्रेट लीडर ऐसा नहीं करता है. जिन तरीको से किसी को मेनीपुलेट किया जा सकता है वो है डर, पीर प्रेशर, एसपाइरेशन, प्राइस, प्रोमोशन और नोवेल्टी. वोट लेने के लिए कोई पोलिटीशियन डर का सहारा ले सकता है. वो पीर प्रेशर से या पैसे देकर या झूठे वादे करके अपने लिए जनता का वोट हासिल कर सकता है. इसी तरह सेल्स इनक्रीज करने के लिए कंपनियां भी अपने प्राइस ड्राप कर लेती है कुछ कम्पनियाँ प्रोमोस और इंसेंसिटिव देती है या फिर नया प्रोडक्ट लांच करती है. मगर ये सब एक अच्छे लीडरशिप का एक्जाम्पल नहीं माना जायेगा. 

मेनीपुलेशन किसी भी कंपनी या ओर्गेनाईजेशन को कमज़ोर ही बनाता है. लोग उन्हें फॉलो तो करते है मगर बस कुछ ही टाइम तक. मेनीपुलेशन के लिए काफी पैसा भी खर्च करना पड़ता है फिर भी ये उतना इफेक्टिव नहीं होता. रेज़र फ़ोन कोई इनोवेशन नहीं था तो इसलिए मोटोरोला लोगो को इंस्पायर करने में नाकाम रही.  फैक्स मशीन, माइक्रोवेव अवन, लाईट बल्ब, और आईट्यून्श ये चीज़े इनोवेशन मानी जायेंगी क्योंकि ये सारे वो प्रोडक्ट है जिन्होंने पूरी इंडस्ट्री चेंज कर दी या कह सकते है कि इनकी वजह से सोसाइटी की लाइफस्टाइल में एक चेंज आया.

 कुछ अलग सोचे

“आओ कुछ अलग सोचे”1984 में जब एप्पल कंपनी बनी तब से लेकर आज तक उसका यही मोटो रहा है. एप्पल ने अपने सभी प्रोडक्ट और एड्वरटाईजिंग में ये बात प्रूव भी की है. जो कुछ भी कंपनी कहती और करती है उसके पीछे कुछ हटकर करना ‘ यही रीजन है. और यही एप्पल का स्ट्रोंग पर्पज है जिसे लेकर कंपनी चलती है. आईट्युन्श ने म्यूजिक इंडस्ट्री को बदल कर रख दिया. 2000 के शुरूवाती दिनों में लोग गानों के लिए सीडी बर्न करते थे. रेकोर्डिंग कंपनियों के लिए पाईरेसी एक बड़ी मुसीबत बन गई थी. तब स्टीव जॉब्स ने आईट्यून्श निकाल कर लोगो के सामने एक आल्टरनेट रखा. आईटुययूंश और आई पैड ने म्यूजिक इंडस्ट्री को डूबने से बचा लिया. 

क्या आपको मालूम है कि एम्पी3 प्लेयर असल में एप्पल ने नहीं बनाया था. दरअसल ये क्रिएटिव टेक्नोलोजी सिंगापोर लिमिटेड के दिमाग की उपज थी. लेकिन फिर इसका सारा क्रेडिट एप्पल कैसे ले गया? क्रिएटिव ने अपने प्रोडक्ट को 5जीबी एमपी3 प्लेयर नाम से रिलीज़ किया था. लेकिन एप्पल ने आई पैड को कुछ ऐसे पेश किया” एक हज़ार गाने आपकी पॉकेट में “. क्रिएटिव ने मार्किट को बताया कि उनका प्रोडक्ट “क्या” है पर एप्पल ने आईपैड “क्यों खरीदे” ये लोगो को बताया. क्योंकि लोग “क्या” नहीं समझते, वे कोई चीज़ “क्यों” है ये समझते है और खरीदते है. 

आई फ़ोन के साथ एप्पल ने एक इनोवेशन किया था. ये मोटोरोला के रेजर की तरह सिर्फ एक नया प्रोडक्ट नहीं था. आई फोन की वजह से ही स्मार्ट फ़ोन का ट्रेंड चल निकला. इसे देखकर नोकिया, एरिक्सन और मोटोरोला ने भी टच स्क्रीन वाले फ़ोन निकाले. आई फोन के ग्राफिक इंटरफेस और सिंपल डिजायन ने मोबाइल फ़ोन की इंडस्ट्री ही बदल कर रख दी. 

क्या आपको ये पता है कि साल 2003 में डेल ने अपना खुद का एक एमपी 3 प्लेयर निकाला था. मगर ये उतना सक्सेसफुल नहीं हुआ जितनी की कंपनी को उम्मीद थी. वजह ये थी कि डेल को लोग एक ऐसी कंपनी के रूप में जानते है जो सिर्फ कंप्यूटर बनाती है ऐसे में उसके मोबाइल या एमपी3 प्लेयर खरीदना लोगो के गले नहीं उतरा. और कुछ सालो बाद डेल ने आखिरकार अपने नए प्रोडक्ट मार्किट से हटा ही दिए. 

मगर एप्पल आखिर कैसे एक कंप्यूटर बनाने वाली कंपनी से मोबाइल और गेजेट्स बनाने वाली कंपनी बन गयी. वो इसलिए क्योंकि एप्पल का एक ही मकसद था “ कुछ अलग सोचना” और यही वजह है कि जो भी प्रोसेसेस और प्रोडक्ट्स कंपनी बनाती है उस सबके पीछे कुछ अलग करने की सोच ही काम करती है.  . 

एप्पल ने अपनी शुरुवात “व्हाई” के साथ की. सबसे पहले तो कंपनी ने एक स्ट्रोंग पर्पज एस्टेबिलिश किया जो था सबसे हटकर सोचना. आज हम एप्पल को “व्हाई “ के लिए जानते है ना कि”व्हट” के लिए. जब कंपनी बनी थी तो इसका लीगल नाम एप्पल कंप्यूटर इंक. रखा गया था लेकिन 2007 में कंपनी ने अपना नाम बदल कर सिर्फ एप्पल इंक कर लिया. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि कंपनी अब कंप्यूटर के अलावा भी काफी कुछ बनाती है. 

ना सिर्फ कंप्यूटर इंडस्ट्री में बल्कि छोटी इलेक्ट्रोनिक्स इंडस्ट्री और मोबाइल फ़ोन में भी एप्पल ने अपनी लीडरशिप कायम की. उन्होंने हमेशा अपना पर्पज बनाये रखा तो इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि वे “क्या” बना रहे है. एप्पल ने इनोवेशन करके और दूसरी इंडस्ट्रीज़ में चेंज लाकर वो कर दिखाया जो एचपी और डेल कंप्यूटर नहीं कर सके. एचपी और डेल ने भी एप्पल की तरह बनने की काफी कोशिश की मगर बन नहीं पाए और फिर वे बस कंप्यूटर बनाने तक ही सिमट कर रह गए. 

 गोल्डन सर्कल 

एचपी और डेल जैसे कंपनिया “व्हट” से शुरुवात करती है. दोनों बढ़िया फीचर वाले प्रोडक्ट लांच करती है फिर भी उनके इतने लॉयल कस्टमर नहीं है जितने कि एप्पल के है. ऐसा नहीं है कि मार्किट में अच्छे कंप्यूटर नहीं है. एक से एक बढ़िया कंप्यूटर बढ़िया स्पेक्स के साथ मार्किट में अवलेबल है फिर भी मैक लवर्स सिर्फ एप्पल को सबसे पहले चुनेगे. जब आप लोगो को बताते हो कि आपका प्रोडक्ट “क्या” है तो लोग उसके बढ़िया फीचर्स को एप्रिशिएट भी करते है मगर जब आप उन्हें अपनी कंपनी का पर्पज भी समझाते है तब जाकर वे आपके लॉयल कस्टमर बनते है. क्योंकि हम इंसानों पर पर्पज, बीलीफ और फीलिंग्स का एक स्ट्रोंग इफेक्ट पड़ता है. क्योंकि हमारा दिमाग बना ही कुछ इस तरह है. 

जिस बात पर कस्टमर बीलीव करते है अगर आपकी कंपनी भी उसी बात पर बीलीव करती है तो कस्टमर कंपनी के लॉयल हो जाते है. और जब कंपनी के एम्प्लोयीज़ भी उस पर्पज को फील करने लगते है तो उन्हें अपने काम में और भी ज्यादा मोटिवेशन मिलती है.अगर आपके पास स्ट्रोंग पर्पज है तो यकीनन आप लोगो को इंस्पायर करके उन्हें लीड कर सकते है तब इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप “क्या” कर रहे है. ज़रा नीचे दिए इस डायेग्राम को देखे. इसमें बने सर्कल के सेंटर में “व्हाई” लिखा है. ये “व्हाई” कंपनी का पर्पज बताता है. उसके बाद अगला लेवल है “हाउ” जिसका मतलब है कि प्रोडक्ट बनाने के लिए कंपनी प्रोसेस और डीसीजन कैसे लेती है. इसके आउटर लेवल पर लिखा है “व्हट” जो बताता है कि वो प्रोडक्ट या सर्विस क्या है जो कंपनी प्रोवाइड कर रही है. 

ज़्यादातर कंपनीज़ सर्कल के आउटसाइड से इनसाइड कम्युनिकेट करती है. वे हमेशा यही बताती है कि उनका प्रोडक्ट कितना अच्छा है. मगर उन्हें ये नहीं पता होता कि एक पर्पज साथ लेकर चलने से लोगो पर इसका ज्यादा इम्पेक्ट पड़ता है. ज़्यादातर कंपनीज़ के पास कोई क्लियर पर्पज नहीं होता कि उन्हें करना क्या है. वही दूसरी तरफ एप्पल जैसी कंपनी इसीलिए सक्सेसफुल होती है क्योंकि वे इनसाइड से आउटसाइड कम्यूनिकेट करती है. जो कुछ एप्पल करती है उसके कोर में एक पर्पज होता है और वो पर्पज है “कुछ अलग सोचना”. और कस्टमर ये बात समझते है तभी तो उन्हें एप्पल के हर प्रोडक्ट में वो पर्पज दिखाई देता है जो उन्हें खरीदने के लिए इंस्पायर करता है. यहाँ कस्टमर इसलिए लॉयल है क्योंकि वे भी एप्पल की तरह एक ही “ कुछ अलग सोचने पर बीलीव करते है. 

अगर आप लीड करना चाहते है तो ये ना सोचे कि आप लोगो को “क्या” दे सकते है. आप “व्हाई” से शुरुवात करे और लोगो को अपना पर्पज बताये. अगर लोग भी उसी पर्पज पर बीलीव करते है जो आपका है तो यकीनन वे आपके लॉयल बन जाएंगे. वे आपसे इंस्पायर होकर आपको फॉलो करने लगेंगे. इस इम्पोर्टेंट कोंस्पेट को याद रखिये. इसे गोल्डन सर्कल कहते है जिसमे “व्हाई’ है आपका पर्पज. “हाउ” है प्रोसेस और “व्हट” है आपका प्रोडक्ट. 

 कॉफी से कुछ बढ़कर 

सेन्स ऑफ़ बीलोंगिंगनेस हम इंसानो में पैदायशी होता है. हम हमेशा सेफ और कनेक्टड फील करना चाहते है. ये एक ह्युमन नीड है कि हम अपने आस-पास से जुड़े रहना चाहते है. जब हम वेकेशन के लिए अपनी कंट्री से बाहर जाते है तो वहां अपनी कंट्री के लोगो को देखकर हमें अच्छा लगता है. हमें ये फील होता है कि हम अपने ही लोगो के बीच है. 

इसी तरह हम उन्ही कंपनीज़ के साथ बेलोंगिंग फील करते है जिनके बीलीफ हमारे जैसे हो. हम उनके प्रोडक्ट इसलिए खरीदते है क्योंकि हमारा “व्हाई” सेम होता है. इससे हमें पता चलता है कि जिस बात पर हम यकीन करते है कंपनी भी करती है. “वे प्रोडक्ट्स और ब्रांड्स हमें बेलोंगिंग की फील कराते है” और हम इस तरह से कंपनी के बाकी कस्टमर से भी कनेक्टेड फील करने लगते है. 

“व्हाई” से अपनी कंपनी या ओर्गेनाइजेश्न की शुरुवात करने से ज्यादा इम्पेक्ट पड़ता है क्योंकि हम इंसान अपना हर काम फीलिंग्स की वजह से ही करते है. ये गोल्डन सर्कल काफी इफेक्टिव है क्योंकि ये हमारे दिमाग के मेजर लेवल्स से रीलेट करता है. आप ‘क्या” बनाते है इससे ज्यादा आप “क्यों” बनाते है इस बात का असर लोगो पर पड़ता है. जो स्टारबक्स ऑफर करता है वो “व्हट” उनका प्रोडक्ट कॉफ़ी है मगर उनका पर्पज “व्हाई” है लोगो को कॉफ़ी पीते हुए कम्फर्टेबल फील करवाना. ये सब जानते है कि स्टारबक्स अपने कस्टमर को एक नाइस फीलिंग और नाइस एक्स्पिरियेंश देता है. यूँ तो बाकी कॉफ़ी शॉप्स भी है जहाँ लोग बैठकर बढ़िया कॉफ़ी पी सकते अहि फिर भी लोग फीलिंग्स की वजह से स्टारबक्स को चूज़ करते है. 

होवर्ड शुल्त्ज़ स्टारबक्स के फाउंडर नहीं है. उन्होंने 1982 में इस कंपनी को ज्वाइन किया था. ये सिएटल में स्टारबक्स की सबसे पहली ब्रांच खुलने के 10 साल बाद की बात है. लेकिन हम आज स्टारबक्स को जिस चीज़ के लिए जानते है वो होवर्ड स्चुल्त्ज़ की वजह से है. ये उनकी ही सोच थी कि स्टारबक्स एक कॉफ़ी से कहीं बढ़कर है. स्चुल्त्ज़ कंपनी के तीनो फाउंडर की वजह से फ्रस्ट्रेट हो गए थे क्योंकि जो वे देख रहे थे वे तीनो फाउन्डर नहीं देख पा रहे थे. जेव सीगल, जैरी बाल्डविन और गॉर्डोन बावलार कस्टमर को सिर्फ कॉफ़ी बीन्स बेचकर ही खुश थे. स्चुल्त्ज़ इटली के एस्प्रेसो बार्स से काफी इंस्पायर थे. वे अपने कस्टमर को एक ऐसा कम्फर्टेबल प्लेस देना चाहते थे जहाँ बैठकर वे आराम से कॉफ़ी के सिप ले सके. स्चुल्त्ज़ स्टारबक्स को लोगो के लिए एक थर्ड स्पेस बनाना चाहते थे जो आराम के कुछ पल गुजारने के लिए घर और ऑफिस के अलावा एक और जगह हो. 

स्चुल्त्ज़ के स्टार बक्स ज्वाइन करने से पहले यूनाइटेड स्टेट्स में बहुत कम कॉफ़ी शॉप्स हुआ करती थी. वो भी सिर्फ कुछ यूनीवेरसिटीज़ के अंदर लेकिन स्टारबक्स के आने से यूनाईटेड स्टेट्स में कॉफ़ी पीना एक कल्चर बन गया.इसने एक कॉफ़ी पीने का एक नया माहौल बना दिया जहाँ बैठकर लोग रीलेक्स कर सकते है , किताबे पढ़ सकते है, अपने लेपटॉप पर काम कर सकते है या फिर दोस्तों के साथ गप्पे मार सकते है. और ये सब होवर्ड स्चुल्त्ज़ के स्ट्रोंग विज़न की वजह से ही पॉसिबल हुआ. उनके पास स्टारबक्स को चलाने का एक पर्पज था. इन दस सालो में स्टारबक्स के शॉप्स की गिनती 1,000 से बढ़कर 13,000 ब्रांचेज के ऊपर पहुँच गयी है. 

होवर्ड स्चुल्त्ज़ एक ग्रेट लीडर है क्योंकि उन्होंने “व्हाई” से शुरू किया. वे स्टारबक्स में एक पर्पज के साथ आये थे. वे लोगो को कम्फर्टेबल फील करवाना चाहते थे और लोगो ने इस फील को रिलेट किया और उनके लॉयल कस्टमर बन गए. बेशक और भी कॉफ़ी शॉप्स होंगी जहाँ बढ़िया कॉफ़ी मिलती है पर स्टारबक्स ने अपनी एक अलग पहचान बना ली है. इसने कॉफ़ी पीने का एक नया कल्चर निकाला जिसे लोगो ने बहुत पसंद किया और यही इसकी सक्सेस का सीक्रेट है. तो हम कह सकते है कि स्टारबक्स ने सोसाइटी बदल दी.

हार्ले-डेविडसन

क्या आपने किसी आदमी को हार्ले डेविडसन के टेटू के साथ देखा है ? क्यों कोई किसी कंपनी के लोगो का टेटू अपनी बॉडी में बनवायेगा? क्या लोग अपनी बॉडी में किसी और कंपनी का भी टेटू बनवाते है?  लोग हार्ले-डेविडसन का टेटू अपनी बॉडी में इसीलिए बनवाते है क्योंकि हार्ले डेविडसन को अपना पर्पज लोगो को समझाना बड़े अच्छे से आता है.  हार्ले-डेविडसन का ये लोगो एक बीलीफ का सिम्बल बन गया है और अमेरिका में तो ये टेटू काफी कॉमन है. जो लोग हार्ले चलाते है उनके लिए हार्ले सिर्फ एक ब्रांड नहीं बल्कि लाइफस्टाइल है. और हार्ले ने ये मुकाम अपने कई सालो की मेहनत, कंसीसटेंसी, डिसप्लीन और क्लेयिरिटी से पाया है. 

जो कुछ भी हार्ले-डेविडसन करता और कहता है वो उसके बीलीफ के साथ चलता आ रहा है. उसमे कोई चेंज नहीं आया कभी. कंपनी ने अपने कुछ उसूल बनाये थे जिन्हें वो आज तक फॉलो करती आ रही है. कंपनी ने अपना एक क्लियर पर्पज रखा था जिसे उसने लोगो तक पहुंचाया. लोगो ने उनकी बात समझी और इंस्पायर हुए. धीरे-धीरे कंपनी का ये लोगो सिर्फ एक सिम्बल ही नहीं बल्कि एक बीलीफ बन गया. हर प्रोडक्ट जो कंपनी बनाती है उसके पीछे यही बीलीफ काम करता है. अपनी बॉडी में हार्ले-डेविडसन का टेटू बनवाने वाले रैंडी फाउलर कहते है” ये टेटू मेरी पहचान का सिम्बल है, या यूँ कहे कि ये मेरी पहचान है और मेरी पहचान है कि मै एक अमेरिकन हूँ“

 डिज़्नी

हमें गोल्डन सर्कल के बारे में पता है. सीइओ कंपनी का लीडर होता है जिसका काम है कंपनी के लिए एक पर्पज सोचना. सीईओ के नीचे एक्ज़ीक्यूटिव काम करते है जिन्हें सीईओ के पर्पज में बीलीव होता है. उन्हें पता है कि इस पर्पज को कैसे रिएलिटी में बदला जाए. लीडर्स “व्हाई” टाइप के लोग है जो विजिनरीज़ होते है. ये ओप्टीमिस्टिक होते है और इस बात पर बीलीव करते है कि जो वो सपने देखते है इमेजीनेशन करते है उन बातो को रियेलिटी में बदला जा सकता है. “हाउ” टाइप के लोग रियलिस्टिक होते है यानी प्रेक्टिकल. वे दुनिया को रियेल तरीके से देखते है. ये लोग सपने नहीं देखते बल्कि जो सामने दिख रहा है उसी पर यकीन करते है. ये “हाउ” टाइप के लोग ही स्ट्रक्चर बनाते है. चीज़े कैसे हासिल की जाए, ये बात उन्हें अच्छी तरह पता होती है. वे काम निकलवाने में माहिर होते है इसीलिए “व्हाई” टाइप के लोग बिना “हाउ” टाइप के कुछ नहीं कर सकते. 

अब हम वाल्ट और रॉय डिज़्नी ब्रदर्स का एक्जाम्प्ल लेते है. वाल्ट डिज़्नी पहले एक एडवरटाइजिंग फर्म में कार्टून आर्टिस्ट का काम करते थे. उन्हें एनिमेटेड मूवीज बनाने का शौक था. ये 1923 की बात है तब हॉलीवुड ने इतनी तरक्की नहीं की थी. अपने भाई वाल्ट डिज्नी से 8 साल बड़े रॉय डिज़्नी एक बैंकर थे. रॉय को अपने भाई वाल्ट के टैलेंट और इमेजीनेशन पर पूरा भरोसा था मगर वो ये भी जानते थे कि पैसे या बिजनेस के मामले में वाल्ट बहुत अच्छे नहीं है. ज्यादतर “व्हाई” टाइप के लोगो की तरह वाल्ट को भी बड़े-बड़े रिस्क लेने की आदत थी. वाल्ट ज़्यादातर फ्यूचर के सपनो में खोये रहते. एक बायो-ग्राफर ने बताया” वाल्ट डिज़्नी कार्टून बनाता था और सपने देखता था. मगर रॉय उसकी परछाई में रहकर एक बड़ा बिजनेस एम्पायर तैयार कर रहा था. रॉय ने फाईनेन्स और बिजनेस के अपने टैलंट को इस्तेमाल किया. रॉय की मदद से ही वाल्ट अपने सपनो को रियल कर पाया. रॉय डिज़्नी ने ब्योना विस्टा कंपनी बनाई जो डिज़्नी फिल्म्स डिस्ट्रीब्यूटकरती थी.. 

रॉय डिज्नी की तरह बहुत से “हाउ” टाइप्स फंक्शल और सक्सेसफुल होते है मगर उनका काम दुनिया बदलना नहीं है. वे किसी को भी इंस्पायर नहीं करते. इंस्पायर करते है सिर्फ “व्हाई” टाइप्स के लोग जैसे वाल्ट डिज्नी. लेकिन “हाउ” टाइप्स के बिना “व्हाई” टाइप के लोग कुछ नहीं कर सकते अगर दोनों मिल जाये तो उनकी स्ट्रोंग पार्टनरशिप से एक बिलियन डॉलर कंपनी खड़ी की जा सकती है. 

बिल गेट्स

बिल गेट्स जैसे ग्रेट लीडर्स में एक करिश्मा होता है क्योंकि उनके पास एक स्ट्रोंग पर्पज है. अपने बीलीफ को वे एक नाम, एक पहचान देते है. और उसे दुनिया तक पहुंचाते है. ग्रेट लीडर्स एक बिजन लेकर चलते है जो पर्सनल से कहीं बढ़कर होता है. उनके पास दुनिया के लिए कुछ प्लान, कुछ कॉज होते है. उनकी अपनी जिंदगी उनके लिए ज्यादा मायने नहीं रखती है. 

बिल गेट्स मानते थे कि किसी भी प्रॉब्लम को सोल्व करने के दो तरीके है. वे ओप्टीमिस्टिक थे. वे मानते थे कि अगर ओब्सटेकल हटा दिए जाये तो कोई भी इंसान अपनी फुल पोटेंशियल का इस्तेमाल कर सकता है. वे उन्हें इस बात पर भी पूरा यकीन था कि अगर लोगो को यूज़फुल टूल्स दिए जाए तो वे सक्सेसफुल बन सकते है इसमे कोई शक नहीं. “हर घर में, हर डेस्क में एक कंप्यूटर हो” यही बिल गेट्स का विजन है और उन्होंने अपना ये विजन माइक्रोसॉफ्ट बनाकर पूरा किया. 

बिल गेट्स ने पॉवर पॉइंट बनाया, एक्सेल और वर्ड बनाया ताकि लोग अपनी जिंदगी में और भी ज्यादा एफ्फिशियेंट, और प्रोडक्टिव बन सके. उन्होंने विंडोज बनाकर लोगो की मदद की जिससे वे कुछ एक्स्ट्राआर्डिनरी कर सके. बिल गेट्स के पास एक विजन था कि लोग टेक्नोलोजी की मदद से अपनी लाइफ में इम्प्रूवमेंट ला सके. माइक्रोसॉफ्ट छोड़ने के बाद भी बिल गेट्स अपने विजन को लेकर चलते रहे.उन्होंने अपनी पत्नी के साथ मिलकर बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन बनाई. वे अब कोई सॉफ्टवेयर नहीं बनाते मगर उन्होंने लाखो करोडो लोगो को एक उनकी लाइफ इम्प्रूव करने की अपोर्च्युनिटी दी. बिल गेट्स मानते थे कि गरीब लोगो को अपोर्च्युनिटी देने से उन्हें खुद को ऊपर उठाने का मौका मिलेगा. उन्हें एम्पोवेरमेंट देने का ये एक जरिया बन सकता है. बिल गेट्स ने अपना ‘व्हट” चेंज किया मगर उनका पर्पज, उनका विजन कभी नहीं बदला.

वोल्क्सवेगन

क्या आपको वोल्क्सवेगन का मतलब पता है ? जर्मन में इसका मतलब होता है लोगो की कार. 70 के टाइम में वोल्क्सवेगन हिप्पी कल्चर का सिम्बल बन गयी थी. कंपनी ने हमेशा ऐसी गाड़िया बनाई है जिसे एवरेज लोग अफोर्ड कर सके. हालांकि 2004 में कंपनी ने एक नयी लक्ज़री कार फेटोंन मार्किट में उतारी जिसकी कीमत थी $70,000. ये कार बहुत बढ़िया फीचर्स के साथ अवलेबल थी. इसके कोम्प्टीटर बीएम्डबल्यू 7 सीरीज और एस क्लास मर्सीडीज़ बेंज थी. मगर फेटोन सक्सेसफुल नहीं हुई. कार की बस गिनी चुनी यूनिट ही बिकी क्योंकि लोगो का कार ज्यादा पसंद नहीं आई. वजह ये थी कि ये लक्ज़री लोगो की समझ से परे थी क्योंकि वोल्क्सवेगन ने हमेशा आम आदमी के लिए अफोर्डेबल गाडिया ही बनाई थी. 

मगर हौंडा और टोयोटा के पास बेटर आईडिया था. दोनों कंपनी ने नए ब्रांड की कारे निकाली जो उनके लक्जरी प्रोडक्ट्स के साथ मैच करती थी. उनके नए लक्ज़री ब्रांड है एक्यूरा और लेक्सस. 

वाल मार्ट 

वाल्ट मार्ट के फाउन्डर सैम वाल्टन बहुत डिप्रेशन में पलकर बड़े हुए इसलिए उन्हें हार्ड वर्क की वैल्यू पता थी . उन्होंने अरकानसस, बेन्टोंनविले में पहला वाल मार्ट स्टोर खोला. तब ये बस एक रीटेल शॉप थी. वहां पर ऐसी और भी रीटेल शॉप्स थी जहाँ बहुत सस्ता सामान मिलता था. लेकिन सिर्फ वाल्ट मार्ट ही टॉप में पहुंचा और वाल मार्ट कुल $44 बिलियन की एनुवल सेल्स करता है.  लेकिन इसका सीक्रेट सैम वाल्टन का हार्ड वर्क और स्टोर के चीप प्राइस नहीं है. इसका सीक्रेट है वाल्टन का पर्पज. उनके स्टोर शुरू करने के पीछे एक बहुत गहरा कॉज छुपा था. एक ऐसा स्ट्रोंग बीलीफ जिसने उन्हें हमेशा मोटीवेट किया.और वो बीलीफ था सैम का लोगो पर यकीन. वे लोगो का ध्यान रखने में बीलीव करते थे. सैम वाल्टन को लगता था कि अगर वो लोगो का ध्यान रखेंगे तो बदले में लोग भी उनका ध्यान रखेंगे. जितना वाल्ट मार्ट अपने एम्प्लोयीज़, अपने कस्टमर और अपनी कम्युनिटी को देते थे बदले में उससे कहीं ज्यादा वाल मार्ट को मिलता था. 

सैम वाल्टन वीकेंड्स पर भी काम करते थे. वे अपने पिक अप ट्रक खुद ही चलाते थे. वे अपने हर एम्प्लोयी का बर्थ डे याद रखते थे और इतना ही नहीं वे बहुत हम्बल भी थे. उन्होंने अपनी सारी जिंदगी लोगो की सेवा के लिए डेडीकेट कर दी थी. जो सेलेरी वो लेते थे वो सालाना $350,000 से भी कम थी. सैम वाल्टन का पर्पज यही था कि वे लोगो को सर्व करना चाहते थे. ये पर्पज उनकी अपनी जिंदगी से बड़ा था और यही वजह है जो वाल मार्ट शौपिंग की दुनिया में इतना सक्सेसफुल रहा. वाल मार्ट सैम वाल्टन के इसी पर्पज को पूरा करने के लिए बना था अप्रैल 5, 1992 में बॉन मेरो कैंसर की वजह से सैम वाल्टन इस दुनिया से चल बसे. उनके मरने के बाद उनके बड़े बेटे एस. रोबेसन वाल्टन वाल मार्ट के चेयरमेंन बने. रोबेसन ने कहा कि कंपनी की पालिसी, कंट्रोल और डाइरेक्शन सब कुछ पहले की तरह ही चलता रहेगा. मगर ऐसा नहीं हुआ. सैम वाल्टन की मौत के बाद वाल मार्ट में काफी चेंजेस आये. कई कस्टमर और एम्प्लोयीज़ ने बदसुलूकी की कम्प्लेंट्स की. कुछ टाइम बाद वाल मार्ट का बंटवारा हो गया और कोस्टको नाम से एक नया रिटेल शॉप खोला गया. 

सैम वाल्टन के जाने के बाद कोई भी सीईओ उनके पर्पज को बरकरार नहीं रख पाया. लोगो को सर्व करने का सैम का बीलीफ और किसी के पास नहीं था. नतीजा ये रहा कि धीरे-धीरे वाल मार्ट अपनी रेपुटेशन खोता चला गया. 2009 में माइकल टी. ड्यूक .नए सीईओ बने जिनकी सेलेरी इयरली  $5.43 मिलियन है.

कन्क्ल्युज़न 

स्टीव जॉब्स, बिल गेट्स और सैम वाल्टन जैसे ग्रेट लीडर्स ने अपने “व्हाई” को एक पहचान दी. जब जॉब्स ने एप्पल छोड़ा, गेट्स ने माइक्रोसॉफ्ट और वाल्टन ने वाल मार्ट तो इन सब कंपनीयों के काम काज में गड़बड़ होने लगी. क्योंकि अपने ग्रेट लीडर के बिना कंपनी अपना पर्पज भूल गयी थी. सिर्फ ग्रेट क्रेडेंशियल का होना ही ज़रूरी नहीं है, हर कंपनी के आने वाले सीईओ को अपने ग्रेट लीडर से इंस्पायर होना बहुत ज़रूरी है उसे उस बात पर पूरी तरह बीलीव होना चाहिए जिस पर कंपनी के फाउन्डर को बीलीव है अगर ऐसा नही होगा तो कंपनी कभी भी अपन पर्पज क्लियर नहीं कर पाएगी.और धीरे-धीरे उसकी रेपुटेशन भी खो जायेगी. . 

लेसन यही है कि किसी भी ऑर्गेनाइजेशन में उसके पर्पज बहुत डीपली रूटेड हो. भले ही कंपनी का फाउन्डर रहे या ना रहे मगर उसका पर्पज हमेशा चलता रहे तभी वो कंपनी सक्सेस के रास्ते में आगे बढती रहेगी. अब आप समझ गए होंगे कि “व्हाई” से शुरुवात करना क्यों ज़रूरी है. अपने पर्पज के बारे में सोचे, वो क्या हो सकता है. ऐसा क्या है जिस पर आप बीलीव करते है ? और जब आपको इन सवालों के ज़वाब मिल जाए तो अपना ”हाउ” (प्रोसेस ) और “व्हट” (प्रोडक्ट) के बारे में सोचना शुरू कर दे कि कैसे आप उसे अचीव कर सकते है. अपने विजन को कभी आँखों से ओझल ना होने दे.जो आप सोचते है, करते है और कहते है उस पर ध्यान दे. बस इस बात का ख्याल रहे कि ये सब आपके पर्पज के साथ मैच करे. एक बात और याद रखे कि आपका पर्पज जितना बड़ा होगा उतनी ही ज्यादा सक्सेस आपको मिलेगी. 

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