YOUR BRAIN ON PORN By Gary Wilson Hindi Book Summary

YOUR BRAIN ON PORN-Internet Pornography and the Emerging Science of Addiction

By- Gary Wilson

----------About Book ----------

क्या आपको भी अपने  पॉर्न  की लत से छुटकारा पाना मुश्किल लगता है? क्या आप ये सोचकर परेशान हैं  कि आप एक   पॉर्न  एडिक्ट बन चुके हैं ? इंटरनेट   पॉर्न  देखने से आज की यंग जेनरेशन को कई तरह के मेंटल और सेक्सुअल डिसऑर्डर हो रहे हैं. इस समरी  में आप पढ़ोगे  कि   पॉर्न  एडिक्शन क्यों और कैसे होती है और ये किस तरह से हमारे ओवरआल well-being के लिए हार्मफुल है. साथ ही आप अपनी   पॉर्न  एडिक्शन से छुटकारा पाने के तरीके भी सीखेंगे. 

🔰 ये समरी किस-किसको पढ़नी चाहिए? 

 👉 यंग एडल्ट्स और टीनएजर्स को जो   पॉर्न  देखते हैं. 

👉 यंग एडल्ट्स के पेरेंट्स और गार्डियन को  

👉 पॉर्न  एडिक्ट  लोगों  के सेक्सुअल और रोमांटिक पार्टनर को 

🔰 ऑथर के बारे में 

गैरी विल्सन कई सालों  तक साइंस टीचर रहे हैं. वो ह्यूमन पैथोलोज़ी, एनाटॉमी और फ़िजियोलोज़ी पढाते हैं. 2010 में उन्होंने   पॉर्न  एडिक्ट्स को हेल्प करने के लिए  “YourBrainOnPorn.com” नाम से एक वेबसाईट बनाई थी. उन्होंने इन्टरनेट   पॉर्न  और एक्सुअल डिसफंक्शन पर US  नेवी के डॉक्टर्स के साथ मिलकर एक academic पेपर भी लिखा था.


---------- SUMMARY ----------

इंट्रोडक्शन 

क्या आपको भी  pornographic  कंटेंट देखने का एडिक्शन है ? क्या आप अपनी इस हैबिट को कण्ट्रोल करने की कोशिश कर रहे है? शायद आपने कभी यूं ही क्यूरियोसिटी में   पॉर्न  देखना स्टार्ट किया हो और अब आपको इसकी इतनी एडिक्शन हो चुकी है कि आप चाह कर भी  नहीं  छोड़ पा रहे. शुरूवात में लोग शौक-शौक में   पॉर्न  देखना शुरू करते है पर बाद में उन्हें इसकी इतनी आदत पड़ जाती है की वो इसमें और ज्यादा इंटेंस कंटेंट एक्सप्लोर करने लगते है. 

फिर धीरे-धीरे   पॉर्न  आपके दिमाग पर हावी होने लगता है. आपकी सेक्सुअल चॉइस और taste  डिस्टर्ब होने लगता है. आपको नॉर्मल सेक्स में मज़ा  नहीं  आता और ज्यादा एन्जॉयमेंट की चाह में आपके माइंड में अजीबो-गरीब फैंटेसीज़ पैदा होने लगती है. शायद कुछ लोग इस वजह से इरेक्टाइल प्रॉब्लम  या सेक्सुअल डिसफंक्शन फेस करने लगते है. आपको अपने पार्टनर के साथ नॉर्मल सेक्स बोरिंग लगता है. दरअसल ये सारी प्रॉब्लम  उन  लोगों  के साथ आती है जो   पॉर्न  एडिक्ट बन चुके है या फिर ज्यादा से ज्यादा वक्त pornographic साइट्स देखना पसंद करते है.   

बहुत से लोग दावा करते है कि   पॉर्न  देखना हमारी मेंटल और फिजिकल सेहत दोनों के लिए हार्मफुल है. कुछ लोग यहाँ तक कहते है कि   पॉर्न  एडिक्शन रियल एडिक्शन है ही नहीं यानि ये लोग मानने से ही इन्कार करते है कि   पॉर्न  एडिक्शन जैसी भी कोई चीज़ होती है. पर सच्चाई कुछ और ही है. इस बारे में कई तरह की रिसर्च  और स्टडीज़ हुई है जिनके बेसिस  पर ये दोनों ही स्टेटमेंट एकदम गलत साबित होते है. आप माने या ना माने पर   पॉर्न  एडिक्शन एक सीरियस प्रॉब्लम  है. 

आप चाहे तो ये मान सकते है कि   पॉर्न  जैसी चीजों की बुराई  करने के पीछे रिलीजियस कारण  है या ये हमारे कल्चर के खिलाफ है, वगैरह-वगैरह. बेशक ये सच है कि हर रिलिजन सेक्स को हमेशा से ही बुरी नज़र से देखता आया है . हालाँकि ये बात साइंस भी प्रूव करती है कि हद से ज्यादा   पॉर्न  देखने के काफी नुक्सान होता है  और इसके लॉन्ग लास्टिंग साइड इफेक्ट्स होते है. 

असल में   पॉर्न  आपके ब्रेन को अफेक्ट करता  है. ये आपके ब्रेन के साथ-साथ बॉडी में भी एक्चुअल फिजिकल चेंजेस लाता है और आपके बिहेवियर पर भी इसका डायरेक्ट असर पड़ता है.   पॉर्न  की एडिक्शन बिल्कुल ऐसी ही है जैसे किसी को ड्रग्स या शराब  की होती है जहाँ  इंसान  धीरे-धीरे अपने दिलो-दिमाग पर कण्ट्रोल खोने लगता है, ठीक यही चीज़   पॉर्न  एडिक्ट्स के साथ भी होती है. ज़्यादातर   पॉर्न के  एडिक्ट मर्द, फिर चाहे वो किसी भी उम्र के हो, इरेक्टाइल डिसफंक्शन के शिकार हो जाते है. इसके अलावा उन्हें और भी कई तरह की मेंटल और सोशल डिसफंक्शन की प्रॉब्लम  होती है. 

इस समरी  में आप जानोगे कि कैसे   पॉर्न  आपके ब्रेन को अफेक्ट कर सकता है. कुछ ऐसे hormones  और केमिकल  होते है जो हमारे ब्रेन को चेंज कर सकते है, और जो लोग ज्यादा   पॉर्न  देखते है उनकी बॉडी में ये hormones और केमिकल्स और भी ज्यादा रिलीज़  होने लगते है. इस समरी  में आप सीखोगे कि कैसे एक प्रोसेस के ज़रिए  हम अपनी   पॉर्न  की लत से छुटकारा पा सकते है और इस प्रोसेस का नाम है रीबूटिंग.

 What Are We Dealing With?

सेक्स एक ऐसी नैचुरल डिजायर है जो हर  इंसान  के अंदर होती है और ये कुदरती तौर पर बेहद नॉर्मल बात है. ह्यूमन ईवोल्यूशन में सेक्स का काफी इम्पोर्टेंट रोल रहा है. अगर हमारे पूर्वज़ इस प्रोसेस से ना गुजरते तो शायद ह्यूमन रेस कब की खत्म हो चुकी होती.  इंसान  के लिए सेक्स सिर्फ एक एन्जॉयमेंट ही  नहीं  बल्कि अपने वंश  को आगे बढाने का  जरिया भी है, यानि सिंपल वर्ड्स में बोले तो  इंसान  अपना परिवार बढ़ाने के लिए सेक्स करता है. 

इसलिए ये ह्यूमन रेस के लिए एक बेहद ज़रूरी  नीड है. हालाँकि वक्त के साथ  इंसान  तरक्की करता गया और साथ ही उसकी सेक्स डिजायर भी ईवोल्व होती गई. जहाँ जानवर रीप्रोडक्शन के लिए सेक्स करते है, वही  इंसान  जितना मॉडर्न  होता गया, उतना ही उसके अंदर सेक्स की भूख बढ़ती गई. मॉडर्न टाइम में pornography  के इस  बढ़ते ट्रेंड ने सेक्स की बेसिक जरूरत को ही बदल डाला है. आज  इंसान  सिर्फ और सिर्फ एन्जॉयमेंट के लिए सेक्स करना चाहता है. masturbation एक इंडीविजुअल एक्टिविटी है जो  इंसान  अकेले में करता है. यही चीज़ इसे अनप्रोडक्टिव बनाती है. 

लेकिन अफ़सोस की बात है कि आज masturbation और   पॉर्न  एडिक्शन एक ही सिक्के के दो पहलू बन गए है.   पॉर्न  एडिक्शन मर्दों में कई तरह की सेक्सुअल डिसफंक्शन पैदा कर रहा है. दिन-रात   पॉर्न  देखने का असर ये होता है कि  इंसान  की लिबिडो यानि सेक्स पॉवर घटने लगती है जोकि इरेक्टाइल डिसफंक्शन की सबसे बड़ी वजह है. ये एक टिपिकल प्रॉब्लम  है जो अक्सर मैरिड लोग फेस करते है या जो किसी औरत के साथ फिजिकल रिलेशन में होते है. 

पर सवाल ये है कि   पॉर्न  की आदत लगती कैसे है ? ऐसी क्या वजह है जो लोग ज्यादा से ज्यादा   पॉर्न  कंटेंट देखना पंसद करते है? विजुअल   पॉर्न  एक सेक्सुअल नोवेल्टी है जिसकी शुरुवात प्रिंटेड मैगजीन से हुई थी. इन मैगजींस में पिक्चर्स होती है जिन्हें देखकर  इंसान अंदर से सेक्सुअली अराउज्ड फील करता है. उस वक्त  इंसान  के माइंड में सेक्सुअल फैंटेसीज़ क्रिएट होने लगती है और वो खुद को उस  इंसान  के साथ इमेजिन करने लगता है जिस पर उसका क्रश होता है  जैसे कोई एक्टर या ऐक्ट्रेस या कोई पडोसी. हालाँकि ये सेक्सुअल एक्साईटमेंट जल्दी ही ख़त्म  भी हो जाती है. यानि आपका ध्यान इधर उधर हुआ  और आप उन पिक्चर्स को भूल जाते हैं. 

बाद में मार्केट में एक्स रेटेड मूवीज़ आने लगी जो काफी हिट हुई. हालाँकि एक्स रेटेड मूवीज़ ईज़िली अवलेबल  नहीं  होती थी, ये सिर्फ वीडियो शॉप में ही बिका करती थी और वीडियो शॉप के अंदर भी इन्हें एक रेस्ट्रीकेटेड जगह  में रखा जाता था ताकि ये माइनर्स यानी बच्चों की पहुँच से दूर रहे. 

फिर डायल अप इंटरनेट का जमाना आया जहाँ से   पॉर्न  वीडियोज़ ईज़िली डाउनलोड की जा सकती थी. हालाँकि इसमे कंप्यूटर वायरस का रिस्क कॉमन था जिसकी वजह से बहुत कम लोग ही   पॉर्न  देख  पाते थे. फिर टाइम आया हाई स्पीड इंटरनेट का. हाई स्पीड इंटरनेट से आप हजारो   पॉर्न  वीडियोज़ स्ट्रीम कर सकते हो. फिर कुछ ऐसी साइट्स बनने लगी जो सिर्फ   पॉर्न  कंटेंट दिखाती थी जिन्हें tube sites  बोला जाता था यानि अब हर कोई ईज़िली   पॉर्न  साईट एक्सेस कर सकता है. 

हाई स्पीड इन्टरनेट से आप बड़ी आसानी से   पॉर्न  की एक वाइड वैराईटी एक्सेस कर सकते है. यानि जितनी भी तरह की   पॉर्न  रिलेटेड फेंटेसीज़ हो सकती है, वो सब आपको उसमें मिल जाती है. ट्यूब साईट्स पर जो   पॉर्न  क्लिप होती, काफी short होती है यानी ये इतना छोटा है कि आप एक ही क्लिप देखकर एक्साइट नहीं होते इसलिए अराउज्ड फील करने के लिए आपको एक से ज्यादा क्लिप देखनी पडती है मतलब  आप एक साथ ही कई सारी वीडियो देख लेते है और हर क्लिप में पहले वाली से ज्यादा हॉट  कंटेंट होता है. 

क्योंकि   पॉर्न  एक सेक्सुअल नोवेल्टी है इसलिए इसे देखकर आपको मज़ा आता है. ये एक्साईटमेंट एक ट्रीगर है. आपका ब्रेन इस फीलिंग को याद रखता है. ये आपको बार-बार   पॉर्न  देखने के लिए उकसाता है और आप अपना ज्यादा से ज्यादा टाइम   पॉर्न देखने में लगाने लग जाते  हो. ज्यादा से ज्यादा एन्जॉयमेंट के लालच में आप घंटो   पॉर्न  साइट्स को एक्सप्लोर करते रहते हो. जितना ज्यादा आप देखते हो, उतना ही आपकी चॉइस भी बदलती जाती है. आप एक के बाद एक अलग-अलग genre एक्सप्लोर करते हो. 

  पॉर्न  कंटेंट की इतनी बड़ी तादाद हमारे ब्रेन को काफी हद तक अफेक्ट करती है. आपके ब्रेन की चेंज करने की एबिलिटी को न्यूरोप्लास्टीसिटी कहते  है. न्यूरोप्लास्टीसिटी का प्रोसेस तब काम करता है जब नए  एक्सपिरियेंस या इन्फोर्मेशन पुराने information या बीलीफ्स को बदलने लगते हैं. 

क्या आप जानते है, आपके ब्रेन को नई-नई चीज़े और बिहेवियर सीखने के लिए rewire किया जा  सकता है. जैसे एक्जाम्पल के तौर पर कुछ  लोगों  को orgasm  की फीलिंग तब तक  नहीं होती  जब तक कि वो एक्सट्रीम   पॉर्न   नहीं  देख लेते. फिर उन्हें रेगुलर या नॉर्मल सेक्स बोरिंग लगने लगता है. 

असल में   पॉर्न  हमारे ब्रेन को रेविरे  कर देता है यानी बदल देता है . फिर आपको असली और रियल  सेक्सुअल रिलेशनशिप में सेटिसफेक्शन  नहीं  मिलती.  पॉर्न  के मुकाबले बाकि रियल लाइफ रिवॉर्ड  फीके लगने लगते है. आपका ब्रेन ये मानने लगता है कि   पॉर्न  देखना ही आपका अल्टीमेट गोल है. ये सिचुएशन ख़ासतौर पर यंग एडल्ट्स और टीनएजर्स के लिए बेहद डेंजरस हो सकती है क्योंकि इस उम्र में हमारा ब्रेन हाईली प्लास्टिक होता है. इसलिय बडो के मुकाबले टीनएजर्स ज्यादा   पॉर्न  एडिक्शन के शिकार हो सकते है. 

  पॉर्न  एडिक्शन से कई तरह के डिसफंक्शन  होने लगते है, जैसे कि सेक्स के वक्त orgasm  होने में काफी टाइम लगता है या फिर कई बार orgasm  होता ही नहीं है और  इंसान  इसे अपनी कमी समझकर डिप्रेशन में चला जाता है. यहाँ तक लोग अपने पार्टनर से ऊबने लगते है और रिलेशनशिप टूट जाता है. स्टडीज़ की माने तो घबराहट, डिप्रेशन, स्ट्रेस और सोशल malfunction जैसी प्रॉब्लम  और   पॉर्न  एडिक्शन का सीधा कनेक्शन है. 

जैसे एक्जाम्पल के लिए पॉल नाम के एक ऑनलाइन यूजर ने शेयर किया कि कैसे   पॉर्न  एडिक्शन ने उसकी लाइफ ही चेंज कर दी थी . बचपन में पॉल एक एथलेटिक, इंटेलीजेंट और सबसे घुलने मिलने वाला  लड़का हुआ करता था. उसके कई सारे दोस्त थे. कुल मिलाकर पॉल का बचपन बड़ा खुशहाल बीता.  

पॉल ने 11 साल की कच्ची उम्र में   पॉर्न  देखना शुरू कर दिया था. धीरे-धीरे उसे हर तरह  के   पॉर्न  की लत लग गई और वो एक्सट्रीम टाइप के   पॉर्न  जैसे dominatrix, animal और  amputee genre देखा करता था. धीरे-धीरे उसे डिप्रेशन और घबराहट  होने लगी. 

अगले 15  सालों  तक पॉल एक एंटी सोशल लाइफ जीता रहा यानी वो लोगों से अलग-थलग रहने लगा था . उसे हर किसी पर गुस्सा आता था , वो घंटो अपने रूम में बंद रहा करता था. उसने स्पोर्ट्स खेलना  छोड़ दिया था . उसकी पढाई-लिखाई पर भी काफी बुरा असर पड़ रहा था. यहाँ तक कि पॉल के मन  में कई बार सुसाईड करने का भी ख्याल आया. 

ज्यादा   पॉर्न  देखने वालो को concentrate  करने में भी काफी  प्रॉब्लम  आती है और ये बात साइंटिस्ट एडिक्शन के बारे में स्टडीज़ करने के बाद कन्फर्म कर चुके है. उन्होंने पाया कि इंटरनेट एडिक्शन से मेमोरी लोस यानि जल्दी भूल जाना, concentrate  करने में दिक्कत आना और इम्पल्स कण्ट्रोल  प्रॉब्लम  जैसी समस्यायें पैदा होती है. एक्जाम्पल के लिए सीरियस ADHD सिम्पटम के पीछे इंटरनेट एडिक्शन एक बहुत बड़ा कारण  है. जो लोग हद से ज्यादा मोबाइल यूज़ करते है या इंटरनेट सर्फ करते है, उन्हें बेचैनी, डिप्रेशन और पर्सनेलिटी डिसऑर्डर जैसी  प्रॉब्लम  होने के चांस ज्यादा होते है. 

यहाँ हम एक और एक्जाम्पल लेंगे. ग्रेग ने जब से हाई स्पीड इंटरनेट यूज़ करना शुरू किया था , उसे   पॉर्न  देखने की लत लग गई क्योंकि हाई स्पीड नेट होने की वजह से ग्रेग जैसे  लोगों  के लिए   पॉर्न  कंटेंट और साइट्स एक्सेस करना ईज़ी हो गया था. नतीजा ये हुआ कि ग्रेग दिन में कई-कई बार masturbate  करता था.   पॉर्न  साइट्स देखकर वो इतना एक्साईटेड हो जाता था कि उसके लिए खुद पर कण्ट्रोल रखना मुश्किल हो गया. एक तरह से कहें  तो masturbation ग्रेग की हैबिट बन गई थी. उसके ब्रेन ने उसके इस नए  बिहेवियर को अपना  लिया था. 

ग्रेग masturbation को एक स्ट्रेस बस्टर की तरह यूज़ करने लगा. जब भी वो परेशान होता तो अपना स्ट्रेस रीलीज़ करने के लिए masturbation की हेल्प लेता. यहाँ तक कि नींद ना आने पर भी उसे इसकी  जरूरत पड़ने लगी थी. धीरे-धीर ग्रेग को   पॉर्न  की लत लग गई. यहाँ तक कि अपनी वाइफ के साथ रिलेशनशिप बनाने से पहले उसे   पॉर्न  देखकर खुद को अराउज़ फील कराना होता था. लेकिन जल्द ही ग्रेग को अपनी वाइफ के साथ सिंपल सेक्स भी बोरिंग लगने लगा क्योंकि उसे मज़ा तो सिर्फ   पॉर्न  में ही आता था. 

जल्द ही ग्रेग को इरेक्टाइल प्रॉब्लम  आने लगी. उसे एजेक्यूलेट करने में काफी वक्त लगता था. उसे orgasm तक पहुँचने में काफी वक्त लगता था और कई बार तो orgasm होता ही नहीं था. यहाँ तक कि ओरल और वेजाईनल सेक्स के बाद भी वो सेटिसफाईड  नहीं  हो पाता था. 

Wanting Run Amok

जैसा कि हमने पहले भी बताया था, अगर आप रेगुलर   पॉर्न  देखते हो तो ये आपके ब्रेन के लिए काफी रीवार्डिंग हो सकता है . इंटरनेट   पॉर्न  में एंडलेस वैराईटी है इसीलिए तो लोग   पॉर्न  एडिक्ट बन जाते है, क्योंकि उन्हें हमेशा कुछ ना कुछ नया देखने को मिलता रहता है जो उन्हें एक तरह से हूक्ड बना देता है. इसलिए लोग घंटो   पॉर्न  साइट्स देखने के बावजूद कभी बोर  नहीं  होते और ना ही   पॉर्न  से उनका मन भरता है. 

एडिक्ट्स के लिए तो   पॉर्न  देखना रीवार्डिंग है.   पॉर्न  एक ट्रिगर की तरह काम करता है जिससे ब्रेन में डोपामाईन रीलीज़ होता है. ये डोपामाईन एक तरह का न्यूरोकेमिकल होता है जिसकी वजह से आपको क्रेविंग और प्लेज़र की फीलिंग आती है. असल में जब हमे किसी चीज़ की लत लगती है तो उसके पीछे डोपामाईन ही मेन रीजन है. जैसे कि सेक्स करते वक्त ब्रेन में डोपामाईन ट्रिगर होता है और आप बार-बार ट्रिगर होने के मौके ढूँढने लगते हो ताकि आपको मज़ा आये. 

 जब किसी एक्शन के बदले रीवार्ड मिलता है तो हम उस एक्शन यानि उस  काम को बार-बार करते है. जैसे एक्जाम्पल के लिए, मान लो आपने फर्स्ट टाइम   पॉर्न  देखा. आपको मज़ा आया क्योंकि आपके माइंड में डोपामाईन रिलीज़  हुआ जिसने आपको प्लेज़र का एहसास कराया. तो आप इस मज़े के लिए नेक्स्ट टाइम फिर से   पॉर्न  देखते हो और बार-बार देखते हो. ये आपके  ब्रेन को काफी रीवार्डिंग लगता है और इस तरह ये एक एडिक्टिव साइकिल बन जाता है. 

आपके ब्रेन में डोपामाईन का लेवल एंटीसिपेशन के साथ बढ़ता जाता है. सिंपल वर्ड्स में बोले तो ये आपको और ज्यादा प्लेज़र ढूँढने के लिए फ़ोर्स करता है और आपको हर बार पहले से ज्यादा बोल्ड कंटेंट देखने का मन करता है. रिसर्च से पता चला  है कि रिवॉर्ड  का लालच और   पॉर्न का मज़ा  आपको और भी ज्यादा एक्साईटेड करने लगता है. 

हद से ज्यादा   पॉर्न  देखना एक तरह से आपको ओवरस्टिमुलेट करता है जिस पर आपका ब्रेन तुरंत रिएक्ट करने लगता है. डोपामाईन जितना ज्यादा रीलीज़ होगा, ब्रेन उसके प्रति उतना ही कम responsive  फील करेगा. ठीक ऐसे ही जैसे बहुत ज्यादा चॉकलेट  खा लेने के बाद  इंसान  को उल्टी आने लगती है क्योंकि उसके मुंह में सेम टेस्ट बार-बार आता है.

और होता ये है कि चॉकलेट से आप बोर हो जाते हो. ठीक यही चीज़   पॉर्न  के साथ भी है. इसलिए   पॉर्न  एडिक्ट हर बार कुछ नया मजा चाहते है. उन्हें सेम चीज़ बोरिंग लगने लगती है यहाँ तक कि लोग एक्सट्रीम   पॉर्न  देखने लगते है तो भी उन्हें सेटिसफेक्शन  नहीं  मिलती और हर बार उन्हें कुछ नए की तलाश होती है जो उन्हें स्टीमुलेट कर सके यानी उन्हें उकसा सके. इससे ब्रेन में ना सिर्फ केमिकल बल्कि फिजिकल चेंजेस भी आने लगते है और इन changes को रिवर्स कर पाना बहुत मुश्किल होता है. 

लेकिन   पॉर्न  की सबसे बड़ी  प्रॉब्लम  ये है कि ये रियेलिटी से कोसों दूर होता है.   पॉर्न  देखने वाले खुद को एक साथ कई पार्टनर के साथ इमेजिन करने लगते है. जबकि रियल लाइफ में हम एक बार में एक ही पार्टनर के साथ रिलेशनशिप बनाते है, वैसे ही जैसे हजारों  सालों  से हमारे पूर्वज करते आये थे यानि   पॉर्न  हमारे सामने एक ऐसा नकली फैंटेसी वर्ल्ड बना देता है जहाँ हम प्लेजर ढूँढने की कोशिश कर रहे होते है. 

  पॉर्न  मूवीज़ या क्लिप्स में   पॉर्न  को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है. साइंटिस्ट इसे सुपरफिशीयल स्टिमुलेशन कहते है. पहली बात, तो नोवेल्टी हमे एक्साईटमेंट और एंटीसिपेशन ऑफर करती है जो आपके ब्रेन में डोपामाईन के रीलीज़ को ट्रिगर करती है. 

दूसरी बात,   पॉर्न  में जेनिटल्स को एबनॉर्मली बड़ा  करके दिखाया जाता है जोकि रियल लाइफ में कम ही देखने को मिलता है. अक्सर   पॉर्न  मूवी स्टार्स के ओवरसाइज्ड ब्रेस्ट और penis  देखकर नॉर्मल लोग inferiority कॉम्प्लेक्स में आ जाते है. 

तीसरी बात,   पॉर्न  वीडियो देखने से आप बहुत ज्यादा  स्टीमुलेट हो जाते हो, आगे क्या होगा ये आपको पता नहीं होता. लोग जो चीजें देखते हैं उससे सीखते भी हैं, ये   पॉर्न  मूवीज का एक  अपीलिंग पार्ट होता है क्योंकि एक अनाड़ी भी   पॉर्न  मूवीज़ देखकर सेक्स के बारे में काफी कुछ सीख जाता है. 

ओवरस्टीमुलेशन से दो प्रॉब्लम  होती है, सेक्सुअल कंडिशनिंग और एडिक्शन. सेक्सुअल कंडिशनिंग में आपका ब्रेन सेक्सुअल एक्साईटमेंट को एक स्क्रीन से जोड़ता है यानि आप अपने पार्टनर यानि की एक रियल  इंसान  के साथ सेक्सुअल फील  नहीं  कर पाते. एक्जाम्पल के लिए जैसे किसी को जब सेक्सुअली अराउज्ड होने में  प्रॉब्लम  आती है तो वो डिफरेंट टाइप के   पॉर्न के scene  को  इमेजिन करने लगता है क्योंकि क्लाइमेक्स तक पहुंचने का उसे यही एक तरीका दिखता है. 

सेक्सुअल कंडीशनिंग आपके  ब्रेन को अराऊजिंग का मतलब  सिखाती है, यही वो चीज़ है जो ब्रेन में डोपामाईन लेवल इनक्रीज करती है. जैसे एक्जाम्पल के लिए अपनी फेवरेट   पॉर्न  साईट टाइप करते वक्त आपका ब्रेन इस एक्शन को सेक्सुअल कंडिशनिंग के ज़रिये  याद रखता है. ये जानता है कि   पॉर्न  आपको प्लेज़र देगा इसलिए अपनी फेवरेट साईट टाइप करते ही आपके ब्रेन में डोपामाईन लेवल बढना शुरू हो जाता है. 

अब जैसे यहाँ हम एक आदमी जेमी  का एक्जाम्पल ले सकते है. उसे ऐसे   पॉर्न  वीडियो देखने ज्यादा पंसद है जहाँ औरतें अपने फेस पर एज़ेकुलेटे होना एन्जॉय करती है. इस तरह के   पॉर्न  देखकर जेमी  के मन में ये बात बैठ गई कि इस तरह का सेक्सुअल बिहेवियर एक नॉर्मल बात है और उसे ये चीज़ काफी अराऊजिंग भी लगती है. जेमी  को ये चीज़ इसलिए अराऊजिंग लगती है क्योंकि उसे ये सीन काफी एक्साईट करता है. हमारा ब्रेन unconsciosly ही उस बिहेवियर को अडॉप्ट कर लेता है जिसे करने में हमे एक्साईटमेंट होती है. लेकिन यहाँ खतरा ये है कि हम और भी ज्यादा एक्सट्रीम टाइप के   पॉर्न  एन्जॉय करने लग जाते है. आपका ब्रेन इस तरह से कंडिशंड हो जाता है कि आपको ये एकदम नॉर्मल लगता है जबकि असल में  ऐसा नहीं है. 

इसका दूसरा रिजल्ट  होता है एडिक्शन. एक्सेसिव   पॉर्न  देखना  इंसान  को एडिक्टिव बना देता है. साइंटिस्ट जानते है कि ड्रग्स से भी आपके ब्रेन में डोपामाईन रिलीज़  होता है. इससे आपमें ब्रेन में तीन तरह  के चेंज आते है जिन्हें thrill कहा  जाता है, ये है: 

    क्रेविंग्स: आपका सारा फ़ोकस  पॉर्न  देखकर खुद को सेटिसफाई करने में लगा रहता है 

    Loss ऑफ़ कण्ट्रोल: आप डिसाइड नहीं कर पाते कि आपको कितना   पॉर्न  देखना चाहिए. 

    Consequences: आपको  अपनी लाइफ के बाकि एरिया जैसे फिजिकल, सोशल, फाईनेंशियल और साईंकोलोजिकल एस्पेक्ट में भी नेगेटिव रिजल्ट देखने को मिलेगा. 

कुछ साइंटिस्ट मानते है कि   पॉर्न  एडिक्शन कोई रियल एडिक्शन है ही  नहीं . उन्हें लगता है कि एडिक्शन सिर्फ चीजों की होती है जैसे शराब और ड्रग्स. लेकिन इंटरनेट एडिक्ट्स पर करीब 70 ब्रेन स्टडीज़ की जा चुकी है और रिजल्ट ये शो दिखाते कि   पॉर्न  एडिक्ट्स का ब्रेन उसी तरह चेंज हो जाता है जैसे शराब और ड्रग्स लेने वालो का हुआ करता है. 

डच researchers  ने इस बारे में कई स्टडीज़ की है कि ऑनलाइन एक्टिविटी किस तरह से एडिक्टिव हो सकती है. उन्होंने पाया कि ऑनलाइन इरोटिका में हायेस्ट एडिक्टिव पोटेंशियल होता है. जबकि ऑनलाइन गेमिंग   पॉर्न  के बाद दूसरे  नंबर पर एडिक्टिव है. 

एक स्टडी से ये पता चला है कि   पॉर्न  देखने से हमारी मोटिवेशन और डिसीजन मेकिंग पॉवर  पर भी असर पड़ता है. हम जितना ज्यादा   पॉर्न  देखेंगे उतना ही हमारे striatum में ग्रे मैटर कम  होता जायेगा. striatum हमारे ब्रेन का वो पार्ट है जो मोटिवेशन और डिसीजन मेकिंग के लिए ज़िम्मेदार होता है. तो ग्रे मैटर जितना कम होता जाएगा, उतना ही कम नर्व कनेक्शन होगा और नर्व कनेक्शन कम होने का मतलब है कि हमारी डिसीजन मेकिंग पॉवर कमजोर होती जाएगी, हम उतने ही सुस्त और नम्ब बने रहेंगे. 

दूसरे शब्दों में कहे तो हमे desensitization की फीलिंग आती है यानि   पॉर्न  एडिक्ट्स   पॉर्न  देखने में जितना ज्यादा इन्वोल्व होते है उतना ही कम rewarding फील करते है, यानि एक तरह से कहें  तो उन्हें कभी सेटिसफेक्शन  नहीं  होता. उन्हें orgasm हासिल करने के लिए और ज्यादा एफर्ट्स लगाने पड़ते है. उन्हें स्टीमुलेट होने के लिए ज्यादा टाइम लगता है. फिर सेक्स उनके लिए एक जरूरत  नहीं  बल्कि एक जुनून बन जाता है. 

Regaining Control

पहला काम जो आपको   पॉर्न  की लत से छुटकारा पाने के लिए करना है, वो है   पॉर्न  देखना एकदम छोड़ दो. अपने ब्रेन को इस अनरियेलिस्टिक ओवरस्टीमुलेशन की दुनिया से पूरी तरह से  ब्रेक लेने दो. इसे हम rebooting कहते है और इस दौरान आप अपना सारा फ़ोकस रियल लाइफ में लगाओ. 

रीबूटिंग का मकसद है अपने मोबाइल या कंप्यूटर स्क्रीन में डूबने के बजाये रियल लाइफ इंटरेक्शन  में ख़ुशीयाँ ढूंढना. जो टाइम आप   पॉर्न  देखने में वेस्ट करते थे, उसे अब आप कुछ क्रिएटिव और प्रोडक्टिव करने में यूज़ करोगे. 

सबसे पहले तो रीबूटिंग आपके ब्रेन के उस पार्ट को रीस्टोर करेगा जो इंटरप्रेट करता है कि ख़ुशी क्या है, किस चीज़ में आपको मज़ा आता है. अपने ब्रेन को   पॉर्न  के बजाए दूसरी चीजों में ख़ुशी ढूंढनी होगी और इसके लिए आपको   पॉर्न  देखना एकदम छोड़ना होगा ताकि माइंड दूसरी चीजों में प्लेज़र ढूंढ सके. इससे आपको रियल लाइफ और रियल  लोगों  के साथ कनेक्ट करने  का मौका भी मिलेगा. 

दूसरी चीज़, ये आपके  मज़े के लिए बार-बार   पॉर्न  देखने की अर्ज़ या हैबिट को कम कर देगा. अर्ज़ यानि वो इंटेंस फीलिंग जो हमे एडिक्शन की तरफ खींचती है. 

तीसरी चीज़, ये आपके  विलपॉवर को बिल्ड करेगा. चाहे आपका मन   पॉर्न  देखने के लिए मचल रहा हो पर आप अपनी विलपॉवर से अपनी टेम्पटेशन को कण्ट्रोल कर पाएंगे. 

और लास्ट में ये आपका स्ट्रेस लेवल भी कम कर देगा जिससे आपको   पॉर्न  देखने की और ज्यादा क्रेविंग फील  नहीं  होगी. 

रीबूटिंग वो मेथड है जिससे उन एडिक्शन के pathway यानी रास्तों  को कमजोर किया जा सकता है जो हमारे ब्रेन ने डेवलप की होती है. इन रास्तों  को ब्लर यानी धुंधला करके आप अपने ब्रेन की सेन्सटीविटी को वापस नॉर्मल बना सकते है. दूसरे  शब्दों में कहें  तो आपका ब्रेन   पॉर्न  के साथ  डोपामाईन रिलीज़  करना कम कर देगा. बेशक इस प्रोसेस में टाइम लगेगा पर आप कोशिश करते रहिये. एक बार अगर आपका ब्रेन   पॉर्न  को प्लेज़र से जोड़कर देखना छोड़ देगा तो आप बेहद हल्का और फ्री महसूस करने लगोगे. फिर आपको कभी स्ट्रेस फ्री होने के लिए   पॉर्न  की हेल्प  नहीं  लेनी पड़ेगी. आप अपनी अर्ज़ और क्रेविग्स को काबू में रखकर सही  डिसीजन ले पाओगे कि आपको अपना खाली  टाइम कैसे स्पेंड करना है.  

लेकिन सवाल है कि   पॉर्न  देखना छोड़े कैसे? तो जवाब है, इसे इतना मुश्किल बना दीजिये कि आप इसे ईजिली एक्सेस ना कर पाएं  क्योंकि जो चीज़ ईज़िली अवलेबल होती है, हम उसे उतना ही ज्यादा यूज़ करते है. आपने शायद अपने एडिक्शन के दौरान कई सारे क्यूज़ डेवलप किये होंगे. इन क्यूज़ को अपनी लाइफ से हटाकर  आप   पॉर्न  से दूर रह सकते है. जैसे एक्जाम्पल के लिए आप अपना एन्वायर्नमेंट चेंज कर दो. 

मान लो आज तक आपने अकेले में बैठकर अपने मोबाइल में खूब   पॉर्न  देखा है तो अब आपको ज्यादा सोशल होना पड़ेगा. घर में अकेले बैठने के बजाए बाहर दोस्तों के साथ टाइम स्पेंड करो या कोई एक्टिविटी या हॉबी डेवलप कर लो जहाँ आप ज्यादा से ज्यादा बिज़ी रह सके. मोबाइल को कम से कम यूज़ करो जिससे आपके   पॉर्न  देखने का मौका  कम हो जाये. यही चीज़ आपके डिजिटल एन्वायर्नमेंट पर भी अप्लाई होती है. आप चाहे तो अपने मोबाइल और कंप्यूटर में   पॉर्न  ब्लॉकर  इंस्टाल कर सकते हो. 

एनवायरनमेंट चेंज का एक और तरीका है, अपना फर्नीचर चेंज कर दो. उस चेयर से छुटकारा पाओ जिसमे बैठकर आप masturbate करते थे क्योंकि ये आपको बार-बार उसी एक्शन की याद दिलाएगी और आप फिर से वही सब करने के लिए टेम्प्ट हो जाओगे. हो सके तो अपना कंप्यूटर भी चेंज कर दो. 

Extinction training भी एक और तरीका है जो आपकी हेल्प करेगा. ये मेथड ट्रिगर और उसके response के बीच के लिंक को कमजोर कर देता है. इसमें आप खुद को   पॉर्न  की क्रेविंग्स से रोकने के लिए ट्रेन करते हो. ये मेथड आपकी विलपॉवर बिल्ड करता है. 

जैसे मान लो, आप   पॉर्न  को अपने पीसी से जोड़कर देखते हो क्योंकि आप अपने पीसी में ही   पॉर्न  देखते आये हो. तो जब भी पीसी  ऑन होगा आप ऑटोमेटिकली   पॉर्न  साइट्स देखने बैठ जाओगे. लेकिन Extinction training में एक एडिशनल स्टेप है. साईट खोलने के बाद ही आप तुरंत उसे बंद कर देते हो. धीरे-धीरे आप   पॉर्न  के बारे में भूल ही जाओगे. बेशक ये मेथड सब पर काम  नहीं  करता. अगर आप बिंज watching करते हो तो एक और तरीका है. आप अपनी विलपॉवर को स्ट्रोंग कीजिये. 

किसी भी एडिक्शन से बाहर आने के लिए हमे किसी सपोर्ट की जरूरत पड़ती है.   पॉर्न  एडिक्शन से छुटकारा पाने के लिए भी यही बात लागू होती है. बहुत से लोग ऑनलाइन फोरम के थ्रू सपोर्ट लेते है. लेकिन ये ध्यान रहे कि आपको ज्यादा टाइम ऑनलाइन भी नहीं रहना है. कुछ लोग अपनी फेमिली, फ्रेंड्स या सपोर्ट ग्रुप्स की हेल्प लेते है. रियल लाइफ सपोर्ट हमे ज्यादा मदद करता है. 

रीबूटिंग का नेक्स्ट कॉम्पोनेन्ट है सेल्फ कण्ट्रोल और सेल्फ केयर की प्रेक्टिस जैसे एक्सरसाइज़, आउटडोर गेम्स या एक्टिविटी, कोई सोशल कॉज ज्वाइन करना, मेडिटेशन या कोई क्रिएटिव हॉबी डेवलप करना. ये सारी चीज़े आपको   पॉर्न  की लत छोड़ने में जरूर हेल्प करेंगी. 

एक्सरसाइज़-  देखा जाये तो वर्कआउट या एक्सरसाइज़ कई मायनों में फायदेमंद है. ये आपको सेक्सुअल अर्ज से दूर रखता है. इससे आपकी हेल्थ और कांफिडेंस दोनों मजबूत होते है. स्टडीज़ ये प्रूव करती है कि रेगुलर एक्सरसाईंज़ से 40 या उससे कम उम्र के मर्दो   को इरेक्टाइल फंक्शन को बैटर करने  में हेल्प मिलती है. 

एक्सरसाइज़ एक सॉलिड मूड रेगुलेटर भी है. ये आपको एडिक्शन से छुटकारा दिलाता है क्योंकि एक्सरसाइज़ से ब्रेन का डोपामाईन लेवल बढ़ता है. रीबूटिंग स्टेज में एक्सरसाइज़ करना काफी फायदेमंद रहेगा क्योंकि उस वक्त   पॉर्न  ना देखने की वजह से आपका डोपामाईन लेवल कम होगा तो रेगुलर एक्सरसाइज़ से इस लेवल को बढ़ाया जा सकता है. 

गेट आउटडोर्स: रीसर्च बताती है कि आउटडोर एक्टिविटीज़ हमारे ब्रेन के लिए काफी फायदेमंद साबित होती है. आउटडोर एक्टिविटीज़ हमारे क्रिएटिविटी लेवल, हमारी नॉलेज  और  प्रॉब्लम  सोल्विंग जैसी स्किल्स को बढ़ाती है. खासतौर पर   पॉर्न  एडिक्ट्स को ज्यादा से ज्यादा आउटडोर एक्टिविटीज़ में इन्वोल्व रहना चाहिए ताकि उन्हें अकेले रहने का मौका कम से कम मिल सके. अकेलापन हमे कई बार नेगेटिव चीजों की ओर लेकर जाता है जिनमे से   पॉर्न  भी एक है. लेकिन आउटडोर रहकर आपका माइंड फ्रेश और क्लीन होता है. 

Socializing- अकेले रहने वाले लोग अक्सर मूड स्विंग का शिकार होते है. इंसान कुदरती तौर पर एक सोशल एनिमल है. हम एक  सोसाइटी में ही बैटर सर्वाइव कर सकते है. अकेले रहने से दिमाग में कई तरह के नेगेटिव थॉट्स  आते है और अक्सर लोग अकेलेपन को दूर करने के लिए ही   पॉर्न  जैसी चीजों का सहारा लेते है. सोशलाईजिंग हमारी बॉडी में  cortisol  लेवल को कम करती है. Cortisol वो होरमोन है जो आपके इम्यून सिस्टम को कमज़ोर  करता है. तो एक रीकवरिंग एडिक्ट को प्लेज़र के लिए दूसरी चीजों की तरफ माइंड डाइवर्ट करना चाहिए जैसे कि सोशल gathering  या अपने दोस्तों के साथ टाइम स्पेंड करना क्योंकि सोशलाईजिंग ब्रेन के लिए एक नैचुरल रिवार्ड है. 

Meditation and relaxation techniques- मेडिटेशन एक पॉवरफुल स्ट्रेस बस्टर है जो हमारे ब्रेन के फ्रंटल लोब्स को डेवलप करने में हेल्प करता है. ये फ्रंटल लोब्स ही वो पार्ट है जो रेशनल थिंकिंग के लिए ज़िम्मेदार  है. जब आप एडिक्ट होते है तब आपकी विलपॉवर भी वीक होती है. लेकिन मेडिटेशन से आप अपनी विलपॉवर को स्ट्रोंग बना सकते है जिससे कि आपको अपने इम्पल्स को कण्ट्रोल करने में भी हेल्प मिलेगी. 

Creative pursuits and hobbies- कोई नई हॉबी डेवलप करने से आपको एडिक्शन छोड़ने में काफी हेल्प मिल सकती है. जब हम बिज़ी रहते है तो माइंड भी बिज़ी रहता है जिससे   पॉर्न  जैसी फालतू चीजों की तरफ ध्यान  नहीं  जाता. रीबूटिंग के शुरुवाती हफ़्ते  बड़े मुश्किल हो सकते है. इस दौरान आपको हर तरह से खुद को बिज़ी रखना चाहिए और बिज़ी रहने का सबसे बढिया तरीका है कि आप कोई हॉबी डेवलप कर ले. कुछ भी ऐसा नया सीखे जो आपके ब्रेन को रीवार्डिंग लगे. पर ध्यान रहे कहीं आप कोई एडिक्टिव हॉबी ना डेवलप कर ले जैसे वीडियो गेमिंग, गैम्बलिंग या सोशल मिडिया प्लेटफॉर्म वर्ना एक एडिक्शन छोड़ने के चक्कर में आपको दूसरी एडिक्शन लग सकती है. ऑनलाइन एक्टिविटीज़ अवॉयड ही करे तो अच्छा है नहीं तो आप   पॉर्न  फिर से देखने के लिए ट्रिगर हो सकते है. 

रीबूटिंग की जर्नी हर किसी के लिए अलग  हो सकती है. कुछ ऐसे तरीके है जिससे आपको पता चल जाएगा कि आपकी   पॉर्न  की लत छूट चुकी है. 

सबसे पहले तो आप नॉर्मल सेक्सुअल बिहेवियर को एक्सपीरियंस करेगे. आपको हेल्थी और नैचुरल तरीके से ईरेक्शन होगा. आपकी लिबिडो एवरेज लेवल की होगी. आपको   पॉर्न  एडिक्ट फेटीशेज़ की  जरूरत महसूस  नहीं  होगी. आपका एक्सट्रीम सेक्सुअल taste जो   पॉर्न  की वजह से डेवलप हुआ था, वो अब रिवर्स  हो जायेगा. 

दूसरी चीज़, आप औरों की तरफ अट्रेक्ट होने लगेंगे यानि आपको रियल पार्टनर के साथ रोमांस या फ्लर्ट करने में ज्यादा इंटरेस्ट आएगा. अगर आप रिलेशनशिप में है तो आप अपने पार्टनर के साथ एक बार फिर से सेक्सुअल इंटरकोर्स एन्जॉय करने लगेंगे. नॉर्मल सेक्स आपको बोरिंग  नहीं  लगेगा. अर्ली मोर्निंग ईरेक्शन भी एक हेल्दी साइन है कि आप अपनी सेक्सुअल डिसफंक्शन से छुटकारा पा चुके है. 

आपको ये समझना जरूरी है कि सेक्स एक नैचुरल नीड है और इस नीड को एक हेल्थी तरीके  में पूरा करने के बाद  इंसान  काफी हल्का महसूस करता है. लेकिन सेक्सुअल क्रेविंग्स और नीड टू रीलिज़ के बीच काफी फर्क है और हमे ये फर्क समझना होगा. 

 आप   पॉर्न  के बिना masturbate   नहीं  कर सकते तो ये आपकी क्रेविंग की सबसे बड़ी निशानी है. लेकिन जब आपको रीलीज़ करने की जरूरत महसूस होती है तो ये अराऊज़ल की निशानी है यानि एक तरह से हम इसे एक हेल्दी साईंन मान सकते है. 

Conclusion

सबसे पहले तो आपने पढ़ा कि सेक्स करना और सेक्स की डिजायर होना एक नॉर्मल चीज़ है. ये एक नैचुरल ह्यूमन बिहेवियर है. हालाँकि   पॉर्न  एडिक्शन इस चीज़ को बेहद मुश्किल  बना देता है. ये आपके फेमिली बिल्ड करने के हेल्दी मोटिव को एक बेहद अनप्रोडक्टिव एक्टिविटी में बदल देता है. जो सेक्स हम सुकून पाने के लिए और अपनी फेमिली आगे बढाने के लिए करते है, उसे   पॉर्न  एक गंदी लत बना देता है जिससे छुटकारा पाना मुश्किल हो जाता है. ये बात प्रूव हो चुकी है कि   पॉर्न  एडिक्शन और masturbation से कई  मेंटल, ईमोशनल और फिजिकल डिसऑर्डर होते है. 

दूसरी चीज़ अपने ये सीखी की   पॉर्न  एडिक्शन एक रियल  प्रॉब्लम है  जिससे आज कई यंग एडल्ट्स जूझ रहे है. एडिक्शन सिर्फ ड्रग्स या शराब की ही  नहीं  होती , विजुअल pornography भी किसी नशे से कम  नहीं  है जो  इंसान  को एक्साईटमेंट और प्लेज़र की ऐसी लत लगा देता है जो किसी भी तरह फिर आसानी से  नहीं  छूटती. 

जब कोई चीज़ एडिक्टिव हो जाये तो आपके पास कोई चॉइस  नहीं  बचती. कई लोग   पॉर्न  एडिक्ट बनने के बाद मेंटल बेचैनी, डिप्रेशन और अकेलेपन जैसी प्रॉब्लम  का शिकार हो जाते है. 

तीसरी बात आपने जाना कि कैसे डोपामाईन आपके ब्रेन के स्ट्रक्चर को चेंज करता है. वो इसलिए क्योंकि आपका ब्रेन प्लास्टिक की तरह है. कोई भी नया  बिहेवियर लर्न करने के लिए आपके ब्रेन में मौजूद केमिकल और hormones मिलकर काम करते है और जो चीज़ आपके ब्रेन को रीवार्डिंग लगती है, वो आपको उसे बार-बार करने के लिए मोटिवेट करती है. इस तरह हमारे अंदर एडिक्शन डेवलप हो जाती है. 

चौथी चीज़, आपने पॉर्न  एडिक्शन से छुटकारा पाने के तरीके सीखे. हालाँकि ये उतना ईज़ी भी  नहीं  है. इस मामले में हर किसी का एक अलग  एक्स्पीरीएंस हो सकता है. कुछ  लोगों  की ये हैबिट कुछ ही महीने में छूट जाती है जबकि कुछ  लोगों  को  सालों  साल लग जाते है. अपने ब्रेन को रीबूट करने का प्रोसेस काफी चैलेजिंग हो सकता है. 

बस ये ध्यान में रखो कि आपका गोल है रियल लाइफ में एन्जॉय और एक्साईटमेंट ढूंढना यानि आप अपने ब्रेन को रियल वर्ल्ड में प्लेज़र फील करना सिखाइए  नाकि वर्चुअल वर्ल्ड में. इसमें रेगुलर एक्सरसाईंज़, सोशलाईजिंग, रिलेक्सिंग और कोई क्रिएटिव हॉबी डेवलप करने से काफी हेल्प मिलती है. 

कई  लोगों  ने रीबूटिंग के साथ अपनी सक्सेस स्टोरीज़ शेयर की है. आप भी   पॉर्न  एडिक्शन छोड़कर एक नार्मल लाइफ एन्जॉय कर सकते हो और दोबारा  रियल रिश्तों में  सच्ची ख़ुशी ढूंढ सकते हो. अब आपको अपनी सेक्सुअल अर्ज़ या क्रेविंग्स का शिकार  नहीं  होना पड़ेगा. 

जो लोग   पॉर्न   नहीं  देखते या देखना छोड़ देते है, वो भी एक नॉर्मल सेक्स ड्राइव और लिबिडो एन्जॉय कर सकते है. शुरू में ये थोडा चैलेजिंग हो सकता है. लेकिन आपको हार  नहीं  माननी है. इस प्रोसेस में वक्त लगता है पर भरोसा रखे और लगातार कोशिश करते रहे और जल्द ही आपकी लाइफ पर आपका कण्ट्रोल होगा. इसके बाद आप ऐसे  फ्रीडम का एहसास कर पाएंगे जहाँ कोई लत, कोई एडिक्शन आपको कमजोर नहीं बना सकेगी.   

YOUR BRAIN ON PORN By Gary Wilson

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